चलो कविता लिखें और मस्ती करें

"जब नहीं शब्द का ज्ञान मुझे, तो स्वागत वचन कहूँ कैसे, जब नहीं मानता मन मेरा, तो फिर खामोश रहूँ कैसे, इसलिए व्यर्थ शब्दों से ही खुद को अगात करता हूँ, नम्र ह्रदय से निज पन्ने पर आपका स्वागत करता हूँ..."

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सर अपना वो यूँ ही झुकाते नहीं हैं

Posted On: 9 Nov, 2015 Others,कविता में

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सर अपना वो यूँ ही झुकाते नहीं हैं
कोई रूठ जाये मनाते नहीं हैं
है हसरत हमारी गले लग के रो लूँ
मगर वो गले से किसी को लगाते नहीं हैं
फिर कभी सोंचता हूँ कि जाकर के मिल लूँ
मगर वो यूँ मिलते मिलाते नहीं हैं
गर वो प्याले को अधरों से स्पर्श कर दें
तो उसमें भर के जहर कोई पी ले
मगर मैंने ऐसा सुना है कहीं पर
ये अमृत किसी को पिलाते नहीं हैं
कभी मन है कहता करें फोन उनको
कभी मिलता नहीं कभी वो उठाते नहीं हैं
मैं आया धरा पर उन्हीं के लिए हूँ
मगर वो हैं कि मुझे आजमाते नहीं हैं
है दिल की तमन्ना सदन उनके जाऊं
मगर वो घर पे बुलाते नहीं हैं
उनकी नज़र में मोहब्बत तो है आग जैसी
इसमें वो जलते जलाते नहीं हैं
और अगर है मोहब्बत तो है एक हद-तक
वो बेहद किसी को सताते नहीं हैं
वादा तो करते हैं रातों में जगकर
मगर दिन में उसको निभाते नहीं हैं
हमीं हैं जो रोते हैं यादों में खोकर
मगर वो तो रोते रुलाते नहीं हैं
मेरा जागता ख़्वाब मुझसे ये बोला
मैं बाहों में उनके जाकर के सो लूँ
क्यूंकि उसने सुना है कहीं पे कुछ ऐसा
वो सोये हुए को उठाते नहीं हैं
मुझपे करम ये भी उनका तो कुछ कम नहीं है
अब ख्वाबों में आकर जगाते नहीं हैं
यही है वो कविता जिनको सुनती है दुनियाँ
मगर वो तो सुनते सुनाते नहीं हैं….

सर अपना वो यूँ ही झुकाते नहीं हैं

कोई रूठ जाये मनाते नहीं हैं


है हसरत हमारी गले लग के रो लूँ

मगर वो गले से किसी को लगाते नहीं हैं


फिर कभी सोंचता हूँ कि जाकर के मिल लूँ

मगर वो यूँ मिलते मिलाते नहीं हैं


गर वो प्याले को अधरों से स्पर्श कर दें

तो उसमें भर के जहर कोई पी ले


मगर मैंने ऐसा सुना है कहीं पर

ये अमृत किसी को पिलाते नहीं हैं


कभी मन है कहता करें फोन उनको

कभी मिलता नहीं कभी वो उठाते नहीं हैं


मैं आया धरा पर उन्हीं के लिए हूँ

मगर वो हैं कि मुझे आजमाते नहीं हैं


है दिल की तमन्ना सदन उनके जाऊं

मगर वो घर पे बुलाते नहीं हैं


उनकी नज़र में मोहब्बत तो है आग जैसी

इसमें वो जलते जलाते नहीं हैं


और अगर है मोहब्बत तो है एक हद-तक

वो बेहद किसी को सताते नहीं हैं


वादा तो करते हैं रातों में जगकर

मगर दिन में उसको निभाते नहीं हैं


हमीं हैं जो रोते हैं यादों में खोकर

मगर वो तो रोते रुलाते नहीं हैं


मेरा जागता ख़्वाब मुझसे ये बोला

मैं बाहों में उनके जाकर के सो लूँ


क्यूंकि उसने सुना है कहीं पे कुछ ऐसा

वो सोये हुए को उठाते नहीं हैं


मुझपे करम ये भी उनका तो कुछ कम नहीं है

अब ख्वाबों में आकर जगाते नहीं हैं


यही है वो कविता जिनको सुनती है दुनियाँ #mce_temp_url#

मगर वो तो सुनते सुनाते नहीं हैं….

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