चलो कविता लिखें और मस्ती करें

"जब नहीं शब्द का ज्ञान मुझे, तो स्वागत वचन कहूँ कैसे, जब नहीं मानता मन मेरा, तो फिर खामोश रहूँ कैसे, इसलिए व्यर्थ शब्दों से ही खुद को अगात करता हूँ, नम्र ह्रदय से निज पन्ने पर आपका स्वागत करता हूँ..."

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तन्हाई मेरी प्रेमिका

Posted On: 7 Jan, 2014 Others,कविता में

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सभी मित्रों और आदरणीय जनों को सादर अभिवादन. आज बहुत दिनों बाद इस मंच पर आना हुआ. इस बीच बहुत सारे नये चेहरे और प्रतिभाशाली लोग इस मंच से से जुड़ें उन्हें पढना हमारा सौभग्य है. आप सभी के बीच अपनी बहुत छोटी से कोशिश प्रस्तुत करता हूँ. उम्मींद है पहले जैसा ही प्यार मिलेगा.

छोड़ कर मुझको अकेला न तू मुझसे दूर जा
ये मेरी तन्हाई अब तू लौट करके पास आ

अब तलक है याद मुझको दिन सुहाने बचपनों के
रोज मिलने जाता था अपने नगर के प्रियजनों से
मिलना बिछड़ना काम था और रोज हँसना रोज रोना

बात करता था हमेशा मुस्कुराकर अनमनों से
फिर मुझे वो गाँव दे दे फिर वही उल्लास ला
ये मेरी तन्हाई अब तू लौट करके पास आ

जब कभी उस भीड़ से उस शोर से उस गाँव से
होकर अलग खुद को निहारा तो तेरा ही साथ पाया
इस जहाँ ने इस गगन ने जब जहाँ भी साथ छोड़ा
बन गई तू प्रेमिका हाथों में तेरा हाथ पाया
आज फिर मैं हूँ अकेला ला तू अपना हाथ ला
ये मेरी तन्हाई अब तू लौट करके पास आ

जब अभी मंदिर गया ध्वनियाँ सुनी दर्शन किया
देखा झुका इस प्रेम के आगे जगत का शीश था
जब माँ की नज़रों से निहारा कृष्ण की उस मूर्ति को
बांसुरी थी हाथ में और अब खड़ा “आशीष” था

पर वो अधुरा दृश्य था कि मैं जहाँ पर कृष्ण था
थी यशोदा दूर मुझसे और न था तेरा पता
कोई जाकरके बुला दे माँ यशोदा को यहाँ पर
और तू भी साथ दे बन करके मेरी राधिका
ये मेरी तन्हाई अब तू लौट करके पास आ

– कुमार आशीष

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 25, 2014

अब तलक है याद मुझको दिन सुहाने बचपनों के रोज मिलने जाता था अपने नगर के प्रियजनों से मिलना बिछड़ना काम था और रोज हँसना रोज रोना बात करता था हमेशा मुस्कुराकर अनमनों से फिर मुझे वो गाँव दे दे फिर वही उल्लास ला ये मेरी तन्हाई अब तू लौट करके पास आ—-चि.कुमार आशीष आपकी रचना उत्कृष्ट है ,बधाई .

    ashishgonda के द्वारा
    October 26, 2014

    प्रशंसा भरी प्रतिक्रिया के लिए आभार….

ajay kumar pandey के द्वारा
February 19, 2014

आशीष भाई आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आप मेरे ब्लॉग तक आये और इस कविता को पढ़ा हार्दिक आभार धन्यवाद

    ashishgonda के द्वारा
    March 7, 2014

    अनुज अजय जी! आप संभवतयः उम्र में मुझसे छोटे हैं पर सिर्फ उम्र में ही छोटे हैं| बाकी सारे क्षेत्र में मेरे ज्येष्ठ हैं, आपको पढना अपने-आप में एक सुअवसर होता है जैसा कि आप जानते हैं मैं आपकी लेखनी का बहुत बड़ा फैन हूँ| आपकी विनम्रता को प्रणाम|

Santlal Karun के द्वारा
January 11, 2014

आदरणीय आशीष जी, आप ने एकाकीपन को विभिन्न परिदृश्यों में निरूपित करते हुए उसकी जीवनगत महत्ता को अभिव्यंजित ढंग से प्रतिपादित किया है, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

    ashishgonda के द्वारा
    January 11, 2014

    आदरणीय सादर चरण सपर्श! सर्वप्रथम प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभार. पर ये “आदरणीय” शंब्द का प्रयोग कैसे उचित लगा वो मैं अनभिग्य समझ नहीं पाया…

vijay के द्वारा
January 9, 2014

आशीष बहुत ह्रदयविदारक अर्थपूर्ण कविता संस्मरण पर आधारित सुंदर आलेख

    ashishgonda के द्वारा
    January 10, 2014

    आदरणीय श्री विजय जी! प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार, मेरे ख़याल आपको इसे दुबारा से पढना चाहिए…

    vijay के द्वारा
    January 13, 2014

    अब तलक है याद मुझको दिन सुहाने बचपनों के रोज मिलने जाता था अपने नगर के प्रियजनों से मिलना बिछड़ना काम था और रोज हँसना रोज रोना बात करता था हमेशा मुस्कुराकर अनमनों से फिर मुझे वो गाँव दे दे फिर वही उल्लास ला मैंने इसे सही पड़ा है आपको जिस शब्द से कुछ गलत महसूस हो रहा तो ऊपर वाली लाइन देखिये

milan के द्वारा
January 8, 2014

बहुत मार्मिक,बधाई अच्छे लेखन के लिए.

    ashishgonda के द्वारा
    January 8, 2014

    परम आदरणीय श्री मिलन जी! प्रतिक्रिया और उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत आभार…

ashishgonda के द्वारा
January 13, 2014

क्षमाँ करे श्री विजय जी! मैंने कुछ और समझा था मेरी गलती थी. मैं क्षमा मांगता हूँ.


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