चलो कविता लिखें और मस्ती करें

"जब नहीं शब्द का ज्ञान मुझे, तो स्वागत वचन कहूँ कैसे, जब नहीं मानता मन मेरा, तो फिर खामोश रहूँ कैसे, इसलिए व्यर्थ शब्दों से ही खुद को अगात करता हूँ, नम्र ह्रदय से निज पन्ने पर आपका स्वागत करता हूँ..."

26 Posts

580 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 9544 postid : 84

आखिरी मर्तबा एक पल देखिये

Posted On: 1 Jul, 2013 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मंच पर उपस्थित सभी आदरणीय जनों को प्रणाम करता हूँ. कुछ पुराने और कुछ नए चेहरे इस मंच पर उपस्थित हैं, मैं ही बहुत देर में आ पाया. आज बहुत समय बाद कोई कविता पोस्ट कर रहा हूँ, उम्मींद है आप सब मेरे गुण-दोष नज़रंदाज़ कर पहले की तरह ही प्यार देंगे. कविता की कमियां बताने में कोई भी संकोच न करे क्योंकि कमी पता चलने पर हम उसे अगली कविता में सुधार कर सकते हैं..सभी का अपनी कविता पर स्वागत करते हुए पंक्तियाँ प्रारम्भ करता हूँ-

आँख बन गई है सज़ल देखिये
है सूखा पड़ा नयनजल देखिये
अब कहेंगे नहीं हम कभी आपसे
आखिरी मर्तबा एक पल देखिये

बिन तुम्हारे जिए हम ज़माने कई
याद आये मुझे दिन पुराने कई
तुम बिना चाँदनी अग्नि जैसी लगी
रो के बीते हैं सावन सुहाने कई
एक दिन शब्द के भी अकिंचन थे हम
गीत का ही बना अब महल देखिये
अब कहेंगे नहीं…..

तुम बिना भूल बैठे हैं बातें कई
करवटों में ही सिमटी हैं रातें कई
लोग हँसते हैं अब मेरे हालात पर
छेड़ जाते हैं ज़ख्म आते-जाते कई
पीड़ा के जल से है सींचा गया
गम के दलदल में खिलता कमल देखिये
अब कहेंगे नहीं…..

तुने थामा नहीं हाथ मेरा तो क्या
खुद के ही पैर पर हम खड़े हो गए
जो छोटा समझता था कल तक मुझे
आज उसी के लिए हम बड़े हो गए
तोड़ देता था वादा जो तुमसे कभी
अपने वादे पर है वो अचल देखिये
अब कहेंगे नहीं…..

बिन तुम्हारे मुझे दौलत, शोहरत मिली
बस तुम्हारे शिवा नहीं कोई कमी
तुम जो होती तो होता जीना मुकम्मल मेरा
पर तुम्हारे बिना है कली अधखिली
अमृत भरा है कलश में मेरे
मगर पी रहा हूँ गरल देखिये
अब कहेंगे नहीं…..

तुने छोड़ा मुझे तो मैंने उड़ाने भरी
मेरी सब ख्वाहिशे आसमां पर गिरी
ख्वाब में भी दुनियाँ ने ठुकराया पर
अब हकीकत में मुझको बुलाने लगी
यह सम्मान सारे अधूरे से हैं
है अधूरी पड़ी यह गज़ल देखिये
अब कहेंगे नहीं…..

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 4.57 out of 5)
Loading ... Loading ...

35 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
October 25, 2014

अमृत भरा है कलश में मेरे मगर पी रहा हूँ गरल देखिये————भावनाओं का बहुत सुंदर चित्रण ,बधाई कुमार आशीष जी .

    ashishgonda के द्वारा
    October 26, 2014

    प्रतिक्रिया और बधाई के लिए धन्यवाद.

abhishek shukla के द्वारा
December 27, 2013

भाई साहब , इतनी छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी बातें कैसे कर लेते हैं आप? भगवन आपको सफल करें…….बहुत बेहतरीन कविता……..

    ashishgonda के द्वारा
    December 31, 2013

    परम स्नेही आदरणीय भ्राता श्री अभिषेक शुक्ल जी! नमस्कार. आपके प्रश्न आपका स्नेह है इसलिए मैं क्या कहूँ उम्र भी “छोटी” है और बात भी…आप “बड़े” लोगो ने पढ़कर उसे “बड़ा” कर दिया…आपका बहुत बहुत आभार… आपने जो “आशीष” दिया उसके ल्ल्यिए विशेष आभार…नवेदन है ऐसे ही अवलोकन करते रहिएगा….हो सके तो मुझसे फेसबुक पर जुड़े,… ashish10gondaATgmail.com

Mann Ki Kawita के द्वारा
November 30, 2013

बिन तुम्हारे मुझे दौलत, शोहरत मिली बस तुम्हारे शिवा नहीं कोई कमी……………………बहुत खूबसूरत कविता

    ashishgonda के द्वारा
    December 31, 2013

    आदरणीय! सादर अभिवादन. ब्लॉग पढ़कर अपने मन की बात कहने के लिए आपका बहुत आभार…ऐसे ही “आशीष” बनाये रखियेगा. पंक्तियों के विशेष सम्मान के लिए विशेष आभार… धन्यवाद.

vijay के द्वारा
September 25, 2013

कभी ख़ुशी से ख़ुशी से ख़ुशी की तरफ नहीं देखा एक तेरे सिवा फिर किसी की तरफ देखा लाज़मी था इंतजार तेरा उम्र भर लेकिन पलट कर मैंने कभी घडी की तरफ नहीं देखा आईने को देखा तो आईने पर झुंझलाया किसी ने अपनी कमी की तरफ नहीं देखा सुंदर कविता बधाई

    ashishgonda के द्वारा
    October 3, 2013

    आदरणीय श्री विजय जी! सादर अभिवादन. सर्वप्रथम आपको प्रतिकिया के लिए आभार… अब चूँकि ये पोस्ट काफी पुरानी हो चुकी है तो कोई इधर ध्यान नहीं देता है क्योंकि यहाँ तो रोज दसियों हज़ार पोस्टिंग होती है वरना लोग मेरी कविता न पढ़ते केवल आपकी प्रतिक्रिया ही पढ़कर हर्षित हो जाते…बहुत सुन्दर प्रतिक्रिया पर बहुत बहुत धन्यवाद.

    ashishgonda के द्वारा
    October 24, 2013

    बहुत बहुत आभार आपको कई बार उत्तर देने की कोशिश की पर शायद किसी तकनीकि समस्या के कारण रह जाता था

    ashishgonda के द्वारा
    August 29, 2013

    आभार..समय मिलते ही पहुँचता हूँ

yogi sarswat के द्वारा
July 26, 2013

तुम बिना भूल बैठे हैं बातें कई करवटों में ही सिमटी हैं रातें कई लोग हँसते हैं अब मेरे हालात पर छेड़ जाते हैं ज़ख्म आते-जाते कई पीड़ा के जल से है सींचा गया गम के दलदल में खिलता कमल देखिये अब कहेंगे नहीं….. मीठे से शब्द

    ashishgonda के द्वारा
    July 27, 2013

    आदरणीय! प्रतिक्रिया के लिए समय देने पर बहुत आभार…देरी के क्षमा मांगता हूँ…

sudhajaiswal के द्वारा
July 6, 2013

छोड़ा मुझे तो मैंने उड़ाने भरी मेरी सब ख्वाहिशे आसमां पर गिरी ख्वाब में भी दुनियाँ ने ठुकराया पर अब हकीकत में मुझको बुलाने लगी यह सम्मान सारे अधूरे से हैं है अधूरी पड़ी यह गज़ल देखिये अब कहेंगे नहीं….. आशीष जी, दर्द-ए-दिल के साज पे छेड़ी है जो ग़ज़ल, वो किस कदर खूबसूरत बन पड़ी है देखिये | बधाई |

    ashishgonda के द्वारा
    July 6, 2013

    प्यारी सुधा चाची जी! सादर अभिवादन. प्रतिक्रिया और कविता के लिए बहुत आभार…. “पाकर अपनों के स्नेह आशीष को, खिल गया है मेरा मन कमल देखिये…अब कहेंगे नहीं हम कभी आपसे आखिरी मर्तबा एक पल देखिये”

yamunapathak के द्वारा
July 6, 2013

nice xpression v must dare to accept everything amrit/garal (or joy/sorrow) that life brings to us……. with gratitude,joy,and with thankfulness life is rainbow of all seven colours,some colours may be not liked by one still one should accept all colours to make d life colourful . thanx

    ashishgonda के द्वारा
    July 6, 2013

    Many thanks for the response. Your feedback is informative and interesting. Welcome to the future will also Thanks

jlsingh के द्वारा
July 5, 2013

अमृत भरा है कलश में मेरे मगर पी रहा हूँ गरल देखिये वाह वाह! वाह वाह! कितनी सुन्दर है अपनी गजल देखिये!

    ashishgonda के द्वारा
    July 5, 2013

    आदरणीय सादर अभिवादन! बहुत ही प्यारी प्रतिक्रिया के लिए बहुत ही धन्यवाद.

anilkumar के द्वारा
July 4, 2013

वाह आशीष जी , ———— वाह ।  गजल मुकम्मल है , यह आपकी ,  जैसे दिल से निकली हुई कोई आह ।। 

    ashishgonda के द्वारा
    July 6, 2013

    आदरणीय! सादर प्रणाम. प्रथम आगमन पर बहुत स्वागत है आपका….प्रतिक्रिया और शेर के लिए आभार…

alkargupta1 के द्वारा
July 4, 2013

प्रिय आशीष , बहुत बढ़िया भावाभिव्यक्ति

    ashishgonda के द्वारा
    July 6, 2013

    आदरणीया ताई जी! सटीक प्रतिक्रिया के लिए आभार…

nishamittal के द्वारा
July 4, 2013

सुन्दर प्रभावपूर्ण रचना सदा की भांति

    ashishgonda के द्वारा
    July 6, 2013

    आदरणीया माँ जी! सादर चरण-स्पर्श! सटीक प्रतिक्रिया स्वरुप आशीष सदा की भांति…के लिए आभार…..

July 4, 2013

तुने थामा नहीं हाथ मेरा तो क्या खुद के ही पैर पर हम खड़े हो गए जो छोटा समझता था कल तक मुझे आज उसी के लिए हम बड़े हो गए bahut sundar bhavabhivyakt kiye hain aasheesh ji .very nice .thanks to share.

    ashishgonda के द्वारा
    July 6, 2013

    माननीय एडवोकेट जी! प्रतिक्रिया करने और पंक्तियों के विशेष सम्मान के लिए आपको विशेष आभार….

seemakanwal के द्वारा
July 3, 2013

बहुत सुन्दर लिखा बधाई

    ashishgonda के द्वारा
    July 6, 2013

    आदरणीया! ह्रदय स्पर्शी प्रतिक्रिया के लिए आभार.

priti के द्वारा
July 1, 2013

आँख बन गई है सज़ल देखिये है सूखा पड़ा नयनजल देखिये अब कहेंगे नहीं हम कभी आपसे आखिरी मर्तबा एक पल देखिये ………अति उत्तम भावाभियक्ति …..सुन्दर प्रस्तुतीकरण …..हार्दिक बधाई ! आशीष …

    ashishgonda के द्वारा
    July 1, 2013

    आदरणीया! प्रतिक्रिया और बधाई के लिए बहुत बहुत आभार..निवेदन है ऐसे ही अवलोकन करते रहिएगा प्रणाम.

Sushma Gupta के द्वारा
July 1, 2013

प्रिय आशीष ,आज जब मै आपको याद करके सोच ही रही थी कि आशीष बहुत समय से ब्लॉग एवं फेसबुक पर क्यों नहीं …अचानक जैसे ही मैंने फेसबुक खोली ,तभी आपका मेसेज देखा ,अभी आपकी गजल पद रहीं हूँ ,जो काफी दमदार है,और उसकी सबसे सुन्दर लाइन हैं ”अमृत भरा है कलश में, मेरे मगर पी रहा हूँ गरल देखिये ” मेरे ब्लॉग पर आप भी एक गजल व् कुछ कवितायें पद सकते हैं , यदि पर्याप्त समय हो ,तो ..

    ashishgonda के द्वारा
    July 1, 2013

    आदरणीया! सादर अभिवादन. स्मृति बनाये रखने के लिए बहुत धन्यवाद. मैं भी आप को याद किया करता हूँ परिवार के सदस्यों के बीच अक्सर आप लोग चर्चा का कारण बनते हैं. प्रतिक्रिया करने रचना पसंद करने के लिए आभार…. जल्दी ही आपकी रचनाओं से रुबरु होने की कोशिश करूँगा. प्रणाम.

milan के द्वारा
July 1, 2013

सुन्दर कविता. पढ़कर अच्छा लगा.लिखते रहिए.ज्यादा क्या कहें. बस जमाने का हाल ए हलचल देखिए. आखिरी मर्तबा एक पल देखिए.C

    ashishgonda के द्वारा
    July 1, 2013

    आदरणीय! सादर अभिवादन. ब्लॉग पर प्रथमआगमन पर स्वागत है. प्रतिक्रिया और स्नेह स्वरुप पंक्तीयों के लिए ह्रदय से धन्यवाद. “यही है दुआ आप आते रहें, कुछ मेरी सुने कुछ अपनी सुनाते रहें…” प्रणाम.


topic of the week



latest from jagran