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"जब नहीं शब्द का ज्ञान मुझे, तो स्वागत वचन कहूँ कैसे, जब नहीं मानता मन मेरा, तो फिर खामोश रहूँ कैसे, इसलिए व्यर्थ शब्दों से ही खुद को अगात करता हूँ, नम्र ह्रदय से निज पन्ने पर आपका स्वागत करता हूँ..."

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एक मार्मिक प्रेम-कथा

Posted On: 19 Nov, 2012 Others में

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सरिता के तट पर एक बार
सहसा ही पहुँच गया था मैं
कारण था कोई खास नहीं
अपने गम में खोया था मैं
जब नज़र गई जल के अंदर
देखा एक बाला नहा रही
ग्रामीण वेश चंचल चितवन
जिससे वह मुझको निरख रही
आकर्षण उनके नयनों का
आकर्षित मुझको करता था
उन्मुक्त हंसी मासूम अदा
मन मेरा विचलित करता था
चोरी-चोरी चुपके-चुपके
कोई था मुझको खींच रहा
निष्ठुर बनकर निर्दयी कोई
मानो मेरा दिल भींच रहा
कटि क्षीण मगर उन्नत उरोज
भीगे बस्तों में लिपटा कर
लहराकर नागिन सी चोटी
आ गई सरोवर के तट पर
मिलते ही नज़र न जाने क्यूँ
कदली पत्तल सी काँप गई
शायद वह मेरी नज़रों का
नापाक इरादा भाँप गईं
शरमाकर सिमट गई ऐसे
जैसे हो कोई छुई-मुई
भोलेपन से मुँह फेर लिया
भीगी पलकों थी झुकी हुई
पहने तो नूतन वस्त्र मगर
आभा उसकी थी दमक रही
जैसे बरसाती मेघों में
चंचल बिजली हो चमक रही
निज सदन पयान किया उसने
दिल मेरा खिंचा जा रहा था
वे जान शरीर खड़ा था मैं
दिन में ही लुटा जा रहा था
कुछ दूर गई थी वह सहसा
चलते-चलते ठिठक गई
देखा पीछे मुड़कर उसने
जैसे अपना पथ भटक गई
नज़रों के मूक निमंत्रण से
वह देवी मुझको बुलाती थी
असहाय भाव था चेहरे पर
कुछ कहने से सकुचाती थी
खामोश लबों की बेताबी
मुझसे न देखी जाती थी
जैसे कोई अधिखिली कली
भँवरे पर झुकती जाती थी
तब तक सखियों के शब्द बाण
सुनते-सुनते वह हार गई
इसलिए बहारें साथ लिए
सखियों के साथ सिधार गई
घर लौटे तो हमने पाया
बेजान शरीर  हमारा है
अहसास मुझे यह होता था
मिटता सुख चैन हमारा है
वह दृश्य अभी तक आँखों से
मेरे न ओझल होता था
रह-रहकर मेरा चंचल मन
कुछ और भी चंचल होता था
आँखे फिर उसे देखने को
व्याकुल सी होती जाती थी
उसकी भोली-भाली सूरत
लखने को ये ललचाती थी
थी कौन कहाँ से आयी थी
कुछ भी तो समझ नहीं पाया
कुछ पता ठिकाना लिए बिना
दिल उसे अपना लुटा आया
उम्मींदों के सपने लेकर
फिर उसी जगह मैं पहुँच गया
जिस जगह एक दिन पहले थी
मेरा दिल मुझसे बिछुड़ गया
थे बहुत नहाने वाले पर
एक वही न अब तक आयी थी
वह चली गईं हो घर शायद
यह शंका ही दुखदायी थी
असमंजस की स्थिति में था
कुछ भी समझ में न आता था
घर लौट चलूँ या रुकूँ अभी
कोई न मुझे बतलाता था
वह आएगी या चली गई
आखिर हम पूंछे तो किससे
जिसका कोई परिचय न हो
फिर उसका पता लगे किससे
वह इंतजार की कठिन घड़ी
मुझसे न काटी जाती थी
मन व्याकुल होता जाता था
चिंता भी बढती जाती थी
उम्मींद मिलन की अब उससे
रह-रह कर घटती जाती थी
जैसे कि मौत-जिंदगी की
दूरी सी मिटती जाती थी
अनमने भाव से जैसे ही
मैंने वापस जाना चाहा
जैसे अपनों को तजकर
गैरो से हो मिलना चाहा
तब तक देखा कुछ दूरी पर
वह दौड़ी चली आ रही है
कुछ होश नहीं था सखियों का
वह आगे बढ़ी आ रही है
हमने भी अपने दिलबर के
क़दमों में आँख बिछा दी थी
नयनों को दर्शन करने की
सारी विधा बतला दी थी
वह चंद्रमुखी मृगनयनी फिर
थी मेरे पास चली आयी
जैसे कि भँवरे से मिलने
मधुबन से कोई कली आयी
लब थर-थर काँप रहे पर
प्रत्यक्ष न कुछ आवाज़ हुई
कुछ बोल नहीं पायी थी वह
केवल नयनों से बात हुई
दिल धाड़-धाड़ होकर बजता
नर्वस मैं होता जाता था
न जाने कैसा सम्मोहन सा
मुझ पर छाता जाता था
वह मेरी व्याकुलता लखकर
होंठों में ही मुस्काती थी
मानों वह मेरे बारे में
संतुष्ट सी होती जाती थी
अजनवी नहीं थे हम उसके
वह मुझसे परिचित लगती थी
यूँ उसने प्रकट किया जैसे
वह अक्सर मुझसे मिलती थी
परिचय उसका न पूँछ सका
तब तक सखियों ने घेर लिया
जैसे पूनम के चंदा को
राहू-केतु ने घेर लिया
हो शर्म से पानी वह
सखियों से आँख मिला न सकी
मिलना होगा फिर कब अपना
मुझको भी कुछ बतला न सकी
सखियों के संग तब उसने भी
अपने कुछ वस्त्र उतार दिए
उस अर्धनग्न चंचल बाला के
गाल शर्म से लाल हुए
मुझको अपना कुछ होश न था
बस उसे देखता जाता था
जिस चंद्रमुखी का सुन्दर तन
पानी में छिपता जाता था
इस मुलाकात से गद्-गद् हो
मैंने वापस मुड़ना चाहा
इस मधुर मिलन का पंख लगा
अम्बर में था उड़ना चाहा
लेकिन यह आकर्षण कैसा
जो मेरे पाँव रोकता था
हम दूर न हो उससे एक पल
मन मेरा यही सोंचता था
करके साहस मैंने अपने
पैरों के भार उठाये थे
जैसे कि उसके दर्शन हित
ही आज यहाँ हम आये थे
इस तरह कई दिन बीत गए
उस देवी के दर्शन करते
अफ़सोस यही न हो पाया
हम उससे कुछ बातें करते
एक दिवस उसी ने साहस कर
“तुम मेरे हो” यह कह डाला
कम्पित होंठो के प्रेम-मन्त्र ने
मुझको विचलित कर डाला
मैं कायर बनकर खड़ा रहा
“तुम भी मेरी हो” कह न सका
उस भोली-भाली बाला के
मन को कुछ धीरज दे न सका
बस इतना भी कह कर उसने
उस जगह पे आना छोड़ दिया
अपने इस पागल प्रेमी को
मझधार में लाकर छोड़ दिया
सोंचा था और कुछ दिनों तक
मिलना उससे संभव होगा
न समझ सका था यह शायद
दर्शन उसका दुर्लभ था
दिन रात उसी की यादों में
खोया-खोया सा सहता था
उस कोमलांगी प्राण प्रिया की
विरह वेदना सहता था
जितना सामित्प मिला उसका
उससे ज्यादा अब दूरी थी
उसकी यादों में रोना ही
शायद मेरी मजबूरी थी
फिर किसी तरह मैंने उसका
परिचय भी प्राप्त कर लिया था
गैरों का हाल पूंछ करके
अपनों का हाल ले लिया था
फिर भी उसके घर जाने की
हिम्मत मैं कभी जुटा न सका
“तुम भी मेरी हो” कहने की
जहमत मैं कभी उठा न सका
हम अनायास ही दिन प्रतिदिन
उन राहों पे आते-जाते
उन गलियों उन चौराहों का
चक्कर एक लगा आते
परिणाम यही की कभी-कभी
वह दर्शन को मिल जाती थी
मेरी इन रोती आँखों की
थोड़ी विपदा हर जाती थी
उस पावन प्रेम परीक्षा में
उत्तीर्ण नहीं मैं हो पाया
उस कोमलांगी प्राणप्रिया की
चाहत पर खरा न मैं हो पाया
मेरी निष्ठुरता के कारण
शायद वह रूठ गई होगी
हालात से तनहा लड़ न सकी
बेबस हो टूट गई होगी
यद्यपि ऐसे विचार मन मन में
प्रतिक्षण ही आते-जाते थे
फिर भी न जाने किस कारण
हम अपना वक्त गवांते थे
जिस अनदेखी पीड़ा की हम
करि पूर्व कल्पना रोते थे
उस विरह व्यथा के बढ़ने पर
हम रातों को नहीं सोते थे
कुछ समय इस तरह बीत गया
न प्यार की पेंगे बढ़ पाई
न मिलना उससे हुआ कभी
न वादे कसमें हो पायीं
थी सोंच यही मेरे मन की
कुछ तो उससे बातें होती
मौखिक यदि संभव नहीं है तो
कागज़ पर लिखकर ही होती
कागज और कलम हाथ में था
बस शब्द नहीं था लिख पाया
तब उसने भी प्रेम-पत्र
था सम्मुख मेरे पहुँचाया
तहरीरे पढ़ कर के उसकी
दिल धीरज न रख पाया
मेरी आँखों ने रो-रोकर
आंसू का सावन बरसाया
हे प्राणेश्वर! हे हृदयेश्वर!
यह प्रेम-पत्र स्वीकार करो
मेरी मजबूरी को प्रियतम
अब हँस-हँस के स्वीकार करो
दूँ दोष तुम्हे या किस्मत को
जिसने हमको है दूर किया
गैरों की बाँह थामने को
मुझ अबला को मजबूर किया
उम्मींद नहीं थी यह तुमसे
कायर बनकर डर जाओगे
सोंचा था हाथ मांगने को
तूम मेरे घर आ जाओगे
बस आज रात बाबुल के घर
तेरी याद रुलाएगी
होते ही भोर पिया के संग
तेरी मैना उड़ जायेगी
ओ छलिया साजन बेदर्दी!
ओ निर्मोही! ओ हरजाई!
न जाने क्यूँ अब तक तुमको
मेरी याद नहीं आयी
अलविदा तुम्हे मेरे प्रियतम
तन का बिछोह स्वीकार करो
देवता मेरे मंदिर के
मानस पूजा स्वीकार करो
यह प्रेम-पत्र के शब्द नहीं
यह तो बिछोह के काँटे थे
जिसने मेरे दिल के टुकड़े
अगणित खण्डों में बाटें थे
बस यही नहीं कुछ और भी तो
उसने ही शर्त लिखी नीचे
सौगंध तुम्हे मेरा प्रियतम
अब पड़ना नहीं मेरे पीछे
मैं समझ रही हूँ भली-भांति
तुम मेरी कसम न तोडोगे
खुशियों का छोड़ आसरा अब
गम से ही नाता जोड़ोगे
बंध गए थे हाथ अब मेरे
सौगंध निभाना था मुझको
अब छोड़ आसरा खुशियों का
गम गले लगाना था मुझको
संदेह नहीं था इसमें कुछ
उस समय भी मैं अपना लेता
गैरों से बाँह छीन उसकी
अपने मैं गले लगा लेता
लेकिन कैसी बेबसी हाय
भल-भल कर पछताता था
उस चंचल चितवन का प्रेमी
कुछ करने को अकुलाता था
पर कसम तोड़ देना भी तो
था मेरे बस का काम नहीं
उस आशा की अभिलाषा का
खंडन करना आसान नहीं
अतएव भाग्य का दोष समझ
अपना कर्तव्य निभाना था
जो भूल-भूल से कर बैठा
उसका प्रतिकार चुकाना था
आँधी बनकर जो आयी थी
तूफां बनकर वह चली गयी
लाई थी चमन साथ में जो
पतझड़ में छोड़ के चली गयी
मन को था संबल दिया बहुत
पर व्यर्थ न यह गम सह पाया
अब तो मेरे इस जीवन में
गम का बादल था घिर आया
वीरान जिंदगी में मेरे
अब हलचल बहुत बढ़ गई थी
गम के तूफान भयंकर में
अब किश्ती मेरी फंस गई थी
देव दोष देकर मैंने
अपना कर्तव्य निभा डाला
उस प्राण-प्रिया के जीवन में
विष मैंने आज मिला डाला
इस भाँती हमारी जीवन निधि
थी सदा को मुझसे दूर हुई
जो सपना बनकर आई थी
सच्चाई बनकर दूर हुई
सोंचा था हमने वक्त सभी
घावों का मरहम होता है
न सोंच सका था यही वक्त
नासूर भी शायद होता है
वो हमसे दूर हुई तो क्या
हम उससे दूर न हो पाये
महफिल में भले हँसे पर
तनहा होकर न हँस पाये
हर समय उसी की यादों में हम
खोये-खोये सहते थे
हर समय जुदाई के सदमे
हम चुपके-चुपके सहते थे
हे देव! कभी इस जीवन में
उसका सामीन्य अगर मिला
मैं अपनी व्यथा-कथाओं का
संक्षिप्त रूप ही कह लेता
बस इसी तरह से जीवन की
मैं रश्म निभाया करता था
इस नीरस जीवन को अपने
मैं सरस बनाया करता था
इस तुच्छ तृप्ति का अंकुर भी
बिन सलिल सूखता जाता था
हर पल, हर क्षण, हर रैन-दिवस
मन ही मन मैं अकुलाता था
इस व्यकुता के कारण ही
मैं और टूटता जाता था
पिछली कायरता सोंच-सोंच
मेरा दम घुटता जाता था
लेकिन मेरे हिय की गति से
अब तक मुंह मोड़ चुकी थी वह
मुझ जैसे कायर प्रेमी से
हर रिश्ता तोड़ चुकी थी वह
इसका अहसास मुझे उस दिन
हो गया, मुझे जब मिली पुनः
वह रूप कमल सी लगती थी
हो खिली कली ज्यों आज सुबह
बाबुल घर तीज मानाने को
प्रिय के घर के वह आयी थी
वह स्वर्ण परी फिर अनायास
मुझको तड़पाने आयी थी
मैं भी उन आँखों में अपना
स्थान खोजने आया था
जो बहुत दिनों से था मन में
वह व्यथा बताने आया था
लेकिन उसके सम्मुख होकर
उन आँखों में झाँक सका
जिस आँखों का दीवाना था
उन आँखों में न झाँक सका
नज़रों से नजरों की चोरी
छुप सकी कहाँ जो छुप जाती
वह मेरे नज़र चुराने से
कुछ मंद-मंद थी मुस्काती
कुछ देर मेरी दयनीय दशा
को देख-देख वह हँसती थी
फिर कानों ने कुछ और सुना
जो शायद मुझसे कहती थी
मेरे सपनों के सह्जादे
मेरे अतीत के राजकुंअर
तेरा गम मुझसे छिपा नहीं
तेरे गम की है मुझे खबर
दुर्भाग्य हमारा ही था जो
मैं तेरी प्रिया न बन पायी
तेरे इन चरणों में अपना
जीवन अर्पण न कर पायी
इसलिए दुखी होकर अब तो
न मुझे और भी तड़पाओ
जो बीत गया वह सपना था
बीती बातों को बिसराओ
हो चुकी परायी हूँ अब मैं
अब मेरा पूज्य मेरा पति है
उसके चरणों में अब तो
है स्वर्ग मेरा और सद्गति है
इसलिए मेरे चितचोर मेरी
दयनीय दशा पर रहम करो
मुझको पथ भ्रष्ट न होने दो
बस इतना मुझ पर रहम करो
लो रोंक आंसुओ को अपने
बिधि के विधान को मत तोड़ो
हो चुकी परायी चीज है जो
हे साजन! उससे मुख मोड़ो
इतना कहकर वह सिसक उठी
करुणामय वक्त हो गया था
कुछ कहने से पहले सुनकर
आकुल उस वक्त हो गया था
उन आँखों का इन हाथों से
आंसू भी मैं न पोंछ सका
कैसे उसको धीरज दूँ मैं
उस वक्त नहीं मैं सोंच सका
लेकिन अपने हिय की प्रिय से
कहने का अच्छा अवसर था
अपनी अभिलाषा मिटाने का
शायद वह स्वर्णिम अवसर था
ये पगली मेरी दीवानी सुन
बस यही मेरी कामना है
मैं आँसू तेरे पोंछ सकूँ
उर में बस यही साधना है
सीने से लगाकर एक बार
कह दो हे देवी बस इतना
जा तुझको मैंने माफ किया
पूरा हो जाये मेरा सपना
विधि के उस अनुपम रचना की
नयनों की ज्योति हुई फींकी
मेरे शब्दों से घायल हो
वह आहत दिल होकर चीखी
ओ मेरे मन के अधिराजा!
ओ मेरे जलवों के प्रेमी!
आराध्य मेरे मन-मंदिर के
ओ मेरी पूजा के प्रेमी!
मैं अबला हूँ दुखियारी हूँ
न मेरी और परीक्षा लो
दीवानी हूँ तेरी प्रियतम
न मेरी अग्नि परीक्षा लो
मिलकर बस गले तेरे प्रियतम
बुझती है दिल की प्यास नहीं
भड़केगी तब तन की ज्वाला
होगा जब कोई पास नहीं
प्यासी सरिता यदि सागर से
व्याकुल होकरके मिल जाए
तो सागर भी यह चाहेगा
बस यूँ ही वक्त ठहर जाए
इसलिए विचार उचित-अनुचित
रोको अपनी इस इच्छा को
मैं आँसू स्वयं पोंछ लुंगी
भूलो मत हरि की इच्छा को
सपनो का सपना रहने दो
मत उसे यथार्थ बनाओ तुम
जो प्रिया किसी की पत्नी है
उसको मत गले लगाओ तुम
सुनकर उसके आदर्श वाक्य
मन ही मन अकुलाता था
अभिप्राय समझ कर मैं उसका
परिणाम से ही घबराता था
सचमुच यदि सोंच उसकी
कायम भविष्य में रह जाए
तो संभव है इस जीवन में
मुझसे हर खुशी रूठ जाये
नादां है बहुत जो उल्फत में
करते हैं बाते राहत की
वह कष्ट सभी सह लेते हैं
है शौक जिन्हें कुछ चाहत की
इसलिए प्यार की राहों में
कुछ पाने की मत चाह करो
जो दुर्लभ है उसके खातिर
अब व्यर्थ और न आह भरो
मेरे बचपन के प्यार सुनो
दो आज्ञा मैं घर जाऊँगी
सच है अपने इस जीवन में
न भूल तुम्हे मैं पाऊँगी
जाती हूँ हंसकर विदा करो
मर मेरे धर्य, धर्म तोड़ो
हँस करके राह जुदा करो
अब अपनी कायरता छोड़ो
यह पराकाष्ठा प्यार की है
जो मुझको बहुत तडपायेगी
मैं जितना तुम्हे भूलाता हूँ
तू उतना मुझे रुलाती है
यद्यपि मैंने तेरी पीड़ा
तुझसे ज्यादा महसूस किया
तेरी हर एक मजबूरी में
खुद को है मजबूर किया
यदि अब भी यही चाहती हो
मेरी राहें हो जाये जुदा
यदि सचमुच सोंच रहती कायम
तो सचमुच हम-तुम हुए जुदा
फिर भी हम अपने जीवन में
क्या एक दूजे को भूलेंगे
सच कहती हो क्या तुम और हम
अपनी यह इच्छा भूलेंगे
तुम नारी हो तुझमे अनंत
बलिदान त्याग है हिम्मत है
लेकिन मैं तुहे न भूल पाऊं
ऐसी मुझमे न हिम्मत है
कायर कह लो या और भी कुछ
उप नाम मुझे दे सकती हो
पर दिल के अरमा को अपने
इनकार नहीं कर सकती हो
यह धर्म सनातन शाश्वत है
यह वेद शास्त्र की शिक्षा है
अनुचित है सदा त्याज्य है यह
जो हम दोनों की इच्छा है
फिर भी मेरे जीवन के
श्रृंगार सृजन करने वाले
ये मेरे बचपन के साथी
मेरी इच्छा रखने वाले
छोटी होकर मैंने तुमको
उपदेश व्यर्थ ही दे डाले
निश्चित ही मुझसे भूल हुई
जो तुम पर यह बंधन डाले
यदि त्याग प्रेम का पूरक है
तो उभय पक्ष ही त्यागी हो
इक दूजे की इच्छाओं के
सहयोगी हो अनुरागी हो
मैने निश्चय ही स्वार्थ भाव से
प्रेरित होकर उपदेश दिए
वह तर्क बहुत ही थोड़े थे
जो अब तक मैंने पेश किये
सच है कि त्याग तुम्हे ही क्यों
हमको भी तो करना होगा
निज धर्म गवांकर भी तेरी
इच्छा मुझको रखना होगा
अब छोड़ विचार उचित-अनुचित
कुछ त्याग आज करना होगा
निज इष्टदेव के चरणों में
खुद को अर्पण करना होगा
प्रस्तुत हूँ आज तुम्हारे हित
पूरी कर लो इच्छा राजा
न कहना मुझे स्वार्थी अब
आ गले लगा लो हे राजा
ठहरो हे देवी! तनिक ठहरो
तुम प्रेम परीक्षा पास हुई
जो आग लगी थी सीने में
अब उस पर है बरसात हुई
बस यही भावना थी उर में
मम प्रिया समर्पण कर देती
खुद पर मेरा हक आज समझ कभी
वह सब कुछ अर्पण कर देती
मैं इतना नहीं अनाड़ी हूँ
जो ऐसा अत्याचार करूँ
दुनियां की बातें कौन करे
खुद की नज़रों में पाप करूँ
यह बात अलग है कि तेरे
जीवन में जहाँ मोड़ आए
वादा है उस चौराहे पर
तू आशीष को सदा खड़ा पाये
लखकर तेरा आदर्श आज
मैं वादा करती हूँ राजा
जीवन में कब भी चाहोगे
मैं मिलने आउंगी राजा
जब भी चाहो अर्पित हूँ
तन-मन जो कुछ है तेरा है
“तुम मेरी हो” “मैं तेरा हूँ”
अब अपना नया सवेरा है…..

सभी मंच के बंधुओ, अग्रजों और मित्रों का यथावत अभिवादन. बहुत दिनों बाद वापसी के लिए क्षमा चाहता हूँ. साथ ही एक अनुरोध करता हूँ कि, कृपया इस कविता को तब पढ़ें जब आपके पास पूर्ण समय हो, क्योंकि कविता लम्बी है और अर्थ अंत में निकलेगा. अतः आप मेरी प्रार्थना को अवश्य ध्यान रखियेगा.

सरिता के तट पर एक बार

सहसा ही पहुँच गया था मैं

कारण था कोई खास नहीं

अपने गम में खोया था मैं

जब नज़र गई जल के अंदर

देखा एक बाला नहा रही

ग्रामीण वेश चंचल चितवन

जिससे वह मुझको निरख रही

आकर्षण उनके नयनों का

आकर्षित मुझको करता था

उन्मुक्त हंसी मासूम अदा

मन मेरा विचलित करता था

चोरी-चोरी चुपके-चुपके

कोई था मुझको खींच रहा

निष्ठुर बनकर निर्दयी कोई

मानो मेरा दिल भींच रहा

कटि क्षीण मगर उन्नत उरोज

भीगे बस्तों में लिपटा कर

लहराकर नागिन सी चोटी

आ गई सरोवर के तट पर

मिलते ही नज़र न जाने क्यूँ

कदली पत्तल सी काँप गई

शायद वह मेरी नज़रों का

नापाक इरादा भाँप गईं

शरमाकर सिमट गई ऐसे

जैसे हो कोई छुई-मुई

भोलेपन से मुँह फेर लिया

भीगी पलकों थी झुकी हुई

पहने तो नूतन वस्त्र मगर

आभा उसकी थी दमक रही

जैसे बरसाती मेघों में

चंचल बिजली हो चमक रही

निज सदन पयान किया उसने

दिल मेरा खिंचा जा रहा था

वे जान शरीर खड़ा था मैं

दिन में ही लुटा जा रहा था

कुछ दूर गई थी वह सहसा

चलते-चलते ठिठक गई

देखा पीछे मुड़कर उसने

जैसे अपना पथ भटक गई

नज़रों के मूक निमंत्रण से

वह देवी मुझको बुलाती थी

असहाय भाव था चेहरे पर

कुछ कहने से सकुचाती थी

खामोश लबों की बेताबी

मुझसे न देखी जाती थी

जैसे कोई अधिखिली कली

भँवरे पर झुकती जाती थी

तब तक सखियों के शब्द बाण

सुनते-सुनते वह हार गई

इसलिए बहारें साथ लिए

सखियों के साथ सिधार गई

घर लौटे तो हमने पाया

बेजान शरीर  हमारा है

अहसास मुझे यह होता था

मिटता सुख चैन हमारा है

वह दृश्य अभी तक आँखों से

मेरे न ओझल होता था

रह-रहकर मेरा चंचल मन

कुछ और भी चंचल होता था

आँखे फिर उसे देखने को

व्याकुल सी होती जाती थी

उसकी भोली-भाली सूरत

लखने को ये ललचाती थी

थी कौन कहाँ से आयी थी

कुछ भी तो समझ नहीं पाया

कुछ पता ठिकाना लिए बिना

दिल उसे अपना लुटा आया

उम्मींदों के सपने लेकर

फिर उसी जगह मैं पहुँच गया

जिस जगह एक दिन पहले थी

मेरा दिल मुझसे बिछुड़ गया

थे बहुत नहाने वाले पर

एक वही न अब तक आयी थी

वह चली गईं हो घर शायद

यह शंका ही दुखदायी थी

असमंजस की स्थिति में था

कुछ भी समझ में न आता था

घर लौट चलूँ या रुकूँ अभी

कोई न मुझे बतलाता था

वह आएगी या चली गई

आखिर हम पूंछे तो किससे

जिसका कोई परिचय न हो

फिर उसका पता लगे किससे

वह इंतजार की कठिन घड़ी

मुझसे न काटी जाती थी

मन व्याकुल होता जाता था

चिंता भी बढती जाती थी

उम्मींद मिलन की अब उससे

रह-रह कर घटती जाती थी

जैसे कि मौत-जिंदगी की

दूरी सी मिटती जाती थी

अनमने भाव से जैसे ही

मैंने वापस जाना चाहा

जैसे अपनों को तजकर

गैरो से हो मिलना चाहा

तब तक देखा कुछ दूरी पर

वह दौड़ी चली आ रही है

कुछ होश नहीं था सखियों का

वह आगे बढ़ी आ रही है

हमने भी अपने दिलबर के

क़दमों में आँख बिछा दी थी

नयनों को दर्शन करने की

सारी विधा बतला दी थी

वह चंद्रमुखी मृगनयनी फिर

थी मेरे पास चली आयी

जैसे कि भँवरे से मिलने

मधुबन से कोई कली आयी

लब थर-थर काँप रहे पर

प्रत्यक्ष न कुछ आवाज़ हुई

कुछ बोल नहीं पायी थी वह

केवल नयनों से बात हुई

दिल धाड़-धाड़ होकर बजता

नर्वस मैं होता जाता था

न जाने कैसा सम्मोहन सा

मुझ पर छाता जाता था

वह मेरी व्याकुलता लखकर

होंठों में ही मुस्काती थी

मानों वह मेरे बारे में

संतुष्ट सी होती जाती थी

अजनवी नहीं थे हम उसके

वह मुझसे परिचित लगती थी

यूँ उसने प्रकट किया जैसे

वह अक्सर मुझसे मिलती थी

परिचय उसका न पूँछ सका

तब तक सखियों ने घेर लिया

जैसे पूनम के चंदा को

राहू-केतु ने घेर लिया

हो शर्म से पानी वह

सखियों से आँख मिला न सकी

मिलना होगा फिर कब अपना

मुझको भी कुछ बतला न सकी

सखियों के संग तब उसने भी

अपने कुछ वस्त्र उतार दिए

उस अर्धनग्न चंचल बाला के

गाल शर्म से लाल हुए

मुझको अपना कुछ होश न था

बस उसे देखता जाता था

जिस चंद्रमुखी का सुन्दर तन

पानी में छिपता जाता था

इस मुलाकात से गद्-गद् हो

मैंने वापस मुड़ना चाहा

इस मधुर मिलन का पंख लगा

अम्बर में था उड़ना चाहा

लेकिन यह आकर्षण कैसा

जो मेरे पाँव रोकता था

हम दूर न हो उससे एक पल

मन मेरा यही सोंचता था

करके साहस मैंने अपने

पैरों के भार उठाये थे

जैसे कि उसके दर्शन हित

ही आज यहाँ हम आये थे

इस तरह कई दिन बीत गए

उस देवी के दर्शन करते

अफ़सोस यही न हो पाया

हम उससे कुछ बातें करते

एक दिवस उसी ने साहस कर

“तुम मेरे हो” यह कह डाला

कम्पित होंठो के प्रेम-मन्त्र ने

मुझको विचलित कर डाला

मैं कायर बनकर खड़ा रहा

“तुम भी मेरी हो” कह न सका

उस भोली-भाली बाला के

मन को कुछ धीरज दे न सका

बस इतना भी कह कर उसने

उस जगह पे आना छोड़ दिया

अपने इस पागल प्रेमी को

मझधार में लाकर छोड़ दिया

सोंचा था और कुछ दिनों तक

मिलना उससे संभव होगा

न समझ सका था यह शायद

दर्शन उसका दुर्लभ था

दिन रात उसी की यादों में

खोया-खोया सा सहता था

उस कोमलांगी प्राण प्रिया की

विरह वेदना सहता था

जितना सामित्प मिला उसका

उससे ज्यादा अब दूरी थी

उसकी यादों में रोना ही

शायद मेरी मजबूरी थी

फिर किसी तरह मैंने उसका

परिचय भी प्राप्त कर लिया था

गैरों का हाल पूंछ करके

अपनों का हाल ले लिया था

फिर भी उसके घर जाने की

हिम्मत मैं कभी जुटा न सका

“तुम भी मेरी हो” कहने की

जहमत मैं कभी उठा न सका

हम अनायास ही दिन प्रतिदिन

उन राहों पे आते-जाते

उन गलियों उन चौराहों का

चक्कर एक लगा आते

परिणाम यही की कभी-कभी

वह दर्शन को मिल जाती थी

मेरी इन रोती आँखों की

थोड़ी विपदा हर जाती थी

उस पावन प्रेम परीक्षा में

उत्तीर्ण नहीं मैं हो पाया

उस कोमलांगी प्राणप्रिया की

चाहत पर खरा न मैं हो पाया

मेरी निष्ठुरता के कारण

शायद वह रूठ गई होगी

हालात से तनहा लड़ न सकी

बेबस हो टूट गई होगी

यद्यपि ऐसे विचार मन मन में

प्रतिक्षण ही आते-जाते थे

फिर भी न जाने किस कारण

हम अपना वक्त गवांते थे

जिस अनदेखी पीड़ा की हम

करि पूर्व कल्पना रोते थे

उस विरह व्यथा के बढ़ने पर

हम रातों को नहीं सोते थे

कुछ समय इस तरह बीत गया

न प्यार की पेंगे बढ़ पाई

न मिलना उससे हुआ कभी

न वादे कसमें हो पायीं

थी सोंच यही मेरे मन की

कुछ तो उससे बातें होती

मौखिक यदि संभव नहीं है तो

कागज़ पर लिखकर ही होती

कागज और कलम हाथ में था

बस शब्द नहीं था लिख पाया

तब उसने भी प्रेम-पत्र

था सम्मुख मेरे पहुँचाया

तहरीरे पढ़ कर के उसकी

दिल धीरज न रख पाया

मेरी आँखों ने रो-रोकर

आंसू का सावन बरसाया

हे प्राणेश्वर! हे हृदयेश्वर!

यह प्रेम-पत्र स्वीकार करो

मेरी मजबूरी को प्रियतम

अब हँस-हँस के स्वीकार करो

दूँ दोष तुम्हे या किस्मत को

जिसने हमको है दूर किया

गैरों की बाँह थामने को

मुझ अबला को मजबूर किया

उम्मींद नहीं थी यह तुमसे

कायर बनकर डर जाओगे

सोंचा था हाथ मांगने को

तूम मेरे घर आ जाओगे

बस आज रात बाबुल के घर

तेरी याद रुलाएगी

होते ही भोर पिया के संग

तेरी मैना उड़ जायेगी

ओ छलिया साजन बेदर्दी!

ओ निर्मोही! ओ हरजाई!

न जाने क्यूँ अब तक तुमको

मेरी याद नहीं आयी

अलविदा तुम्हे मेरे प्रियतम

तन का बिछोह स्वीकार करो

देवता मेरे मंदिर के

मानस पूजा स्वीकार करो

यह प्रेम-पत्र के शब्द नहीं

यह तो बिछोह के काँटे थे

जिसने मेरे दिल के टुकड़े

अगणित खण्डों में बाटें थे

बस यही नहीं कुछ और भी तो

उसने ही शर्त लिखी नीचे

सौगंध तुम्हे मेरा प्रियतम

अब पड़ना नहीं मेरे पीछे

मैं समझ रही हूँ भली-भांति

तुम मेरी कसम न तोडोगे

खुशियों का छोड़ आसरा अब

गम से ही नाता जोड़ोगे

बंध गए थे हाथ अब मेरे

सौगंध निभाना था मुझको

अब छोड़ आसरा खुशियों का

गम गले लगाना था मुझको

संदेह नहीं था इसमें कुछ

उस समय भी मैं अपना लेता

गैरों से बाँह छीन उसकी

अपने मैं गले लगा लेता

लेकिन कैसी बेबसी हाय

भल-भल कर पछताता था

उस चंचल चितवन का प्रेमी

कुछ करने को अकुलाता था

पर कसम तोड़ देना भी तो

था मेरे बस का काम नहीं

उस आशा की अभिलाषा का

खंडन करना आसान नहीं

अतएव भाग्य का दोष समझ

अपना कर्तव्य निभाना था

जो भूल-भूल से कर बैठा

उसका प्रतिकार चुकाना था

आँधी बनकर जो आयी थी

तूफां बनकर वह चली गयी

लाई थी चमन साथ में जो

पतझड़ में छोड़ के चली गयी

मन को था संबल दिया बहुत

पर व्यर्थ न यह गम सह पाया

अब तो मेरे इस जीवन में

गम का बादल था घिर आया

वीरान जिंदगी में मेरे

अब हलचल बहुत बढ़ गई थी

गम के तूफान भयंकर में

अब किश्ती मेरी फंस गई थी

देव दोष देकर मैंने

अपना कर्तव्य निभा डाला

उस प्राण-प्रिया के जीवन में

विष मैंने आज मिला डाला

इस भाँती हमारी जीवन निधि

थी सदा को मुझसे दूर हुई

जो सपना बनकर आई थी

सच्चाई बनकर दूर हुई

सोंचा था हमने वक्त सभी

घावों का मरहम होता है

न सोंच सका था यही वक्त

नासूर भी शायद होता है

वो हमसे दूर हुई तो क्या

हम उससे दूर न हो पाये

महफिल में भले हँसे पर

तनहा होकर न हँस पाये

हर समय उसी की यादों में हम

खोये-खोये सहते थे

हर समय जुदाई के सदमे

हम चुपके-चुपके सहते थे

हे देव! कभी इस जीवन में

उसका सामीन्य अगर मिला

मैं अपनी व्यथा-कथाओं का

संक्षिप्त रूप ही कह लेता

बस इसी तरह से जीवन की

मैं रश्म निभाया करता था

इस नीरस जीवन को अपने

मैं सरस बनाया करता था

इस तुच्छ तृप्ति का अंकुर भी

बिन सलिल सूखता जाता था

हर पल, हर क्षण, हर रैन-दिवस

मन ही मन मैं अकुलाता था

इस व्यकुता के कारण ही

मैं और टूटता जाता था

पिछली कायरता सोंच-सोंच

मेरा दम घुटता जाता था

लेकिन मेरे हिय की गति से

अब तक मुंह मोड़ चुकी थी वह

मुझ जैसे कायर प्रेमी से

हर रिश्ता तोड़ चुकी थी वह

इसका अहसास मुझे उस दिन

हो गया, मुझे जब मिली पुनः

वह रूप कमल सी लगती थी

हो खिली कली ज्यों आज सुबह

बाबुल घर तीज मानाने को

प्रिय के घर के वह आयी थी

वह स्वर्ण परी फिर अनायास

मुझको तड़पाने आयी थी

मैं भी उन आँखों में अपना

स्थान खोजने आया था

जो बहुत दिनों से था मन में

वह व्यथा बताने आया था

लेकिन उसके सम्मुख होकर

उन आँखों में झाँक सका

जिस आँखों का दीवाना था

उन आँखों में न झाँक सका

नज़रों से नजरों की चोरी

छुप सकी कहाँ जो छुप जाती

वह मेरे नज़र चुराने से

कुछ मंद-मंद थी मुस्काती

कुछ देर मेरी दयनीय दशा

को देख-देख वह हँसती थी

फिर कानों ने कुछ और सुना

जो शायद मुझसे कहती थी

मेरे सपनों के सह्जादे

मेरे अतीत के राजकुंअर

तेरा गम मुझसे छिपा नहीं

तेरे गम की है मुझे खबर

दुर्भाग्य हमारा ही था जो

मैं तेरी प्रिया न बन पायी

तेरे इन चरणों में अपना

जीवन अर्पण न कर पायी

इसलिए दुखी होकर अब तो

न मुझे और भी तड़पाओ

जो बीत गया वह सपना था

बीती बातों को बिसराओ

हो चुकी परायी हूँ अब मैं

अब मेरा पूज्य मेरा पति है

उसके चरणों में अब तो

है स्वर्ग मेरा और सद्गति है

इसलिए मेरे चितचोर मेरी

दयनीय दशा पर रहम करो

मुझको पथ भ्रष्ट न होने दो

बस इतना मुझ पर रहम करो

लो रोंक आंसुओ को अपने

बिधि के विधान को मत तोड़ो

हो चुकी परायी चीज है जो

हे साजन! उससे मुख मोड़ो

इतना कहकर वह सिसक उठी

करुणामय वक्त हो गया था

कुछ कहने से पहले सुनकर

आकुल उस वक्त हो गया था

उन आँखों का इन हाथों से

आंसू भी मैं न पोंछ सका

कैसे उसको धीरज दूँ मैं

उस वक्त नहीं मैं सोंच सका

लेकिन अपने हिय की प्रिय से

कहने का अच्छा अवसर था

अपनी अभिलाषा मिटाने का

शायद वह स्वर्णिम अवसर था

ये पगली मेरी दीवानी सुन

बस यही मेरी कामना है

मैं आँसू तेरे पोंछ सकूँ

उर में बस यही साधना है

सीने से लगाकर एक बार

कह दो हे देवी बस इतना

जा तुझको मैंने माफ किया

पूरा हो जाये मेरा सपना

विधि के उस अनुपम रचना की

नयनों की ज्योति हुई फींकी

मेरे शब्दों से घायल हो

वह आहत दिल होकर चीखी

ओ मेरे मन के अधिराजा!

ओ मेरे जलवों के प्रेमी!

आराध्य मेरे मन-मंदिर के

ओ मेरी पूजा के प्रेमी!

मैं अबला हूँ दुखियारी हूँ

न मेरी और परीक्षा लो

दीवानी हूँ तेरी प्रियतम

न मेरी अग्नि परीक्षा लो

मिलकर बस गले तेरे प्रियतम

बुझती है दिल की प्यास नहीं

भड़केगी तब तन की ज्वाला

होगा जब कोई पास नहीं

प्यासी सरिता यदि सागर से

व्याकुल होकरके मिल जाए

तो सागर भी यह चाहेगा

बस यूँ ही वक्त ठहर जाए

इसलिए विचार उचित-अनुचित

रोको अपनी इस इच्छा को

मैं आँसू स्वयं पोंछ लुंगी

भूलो मत हरि की इच्छा को

सपनो का सपना रहने दो

मत उसे यथार्थ बनाओ तुम

जो प्रिया किसी की पत्नी है

उसको मत गले लगाओ तुम

सुनकर उसके आदर्श वाक्य

मन ही मन अकुलाता था

अभिप्राय समझ कर मैं उसका

परिणाम से ही घबराता था

सचमुच यदि सोंच उसकी

कायम भविष्य में रह जाए

तो संभव है इस जीवन में

मुझसे हर खुशी रूठ जाये

नादां है बहुत जो उल्फत में

करते हैं बाते राहत की

वह कष्ट सभी सह लेते हैं

है शौक जिन्हें कुछ चाहत की

इसलिए प्यार की राहों में

कुछ पाने की मत चाह करो

जो दुर्लभ है उसके खातिर

अब व्यर्थ और न आह भरो

मेरे बचपन के प्यार सुनो

दो आज्ञा मैं घर जाऊँगी

सच है अपने इस जीवन में

न भूल तुम्हे मैं पाऊँगी

जाती हूँ हंसकर विदा करो

मर मेरे धर्य, धर्म तोड़ो

हँस करके राह जुदा करो

अब अपनी कायरता छोड़ो

यह पराकाष्ठा प्यार की है

जो मुझको बहुत तडपायेगी

मैं जितना तुम्हे भूलाता हूँ

तू उतना मुझे रुलाती है

यद्यपि मैंने तेरी पीड़ा

तुझसे ज्यादा महसूस किया

तेरी हर एक मजबूरी में

खुद को है मजबूर किया

यदि अब भी यही चाहती हो

मेरी राहें हो जाये जुदा

यदि सचमुच सोंच रहती कायम

तो सचमुच हम-तुम हुए जुदा

फिर भी हम अपने जीवन में

क्या एक दूजे को भूलेंगे

सच कहती हो क्या तुम और हम

अपनी यह इच्छा भूलेंगे

तुम नारी हो तुझमे अनंत

बलिदान त्याग है हिम्मत है

लेकिन मैं तुहे न भूल पाऊं

ऐसी मुझमे न हिम्मत है

कायर कह लो या और भी कुछ

उप नाम मुझे दे सकती हो

पर दिल के अरमा को अपने

इनकार नहीं कर सकती हो

यह धर्म सनातन शाश्वत है

यह वेद शास्त्र की शिक्षा है

अनुचित है सदा त्याज्य है यह

जो हम दोनों की इच्छा है

फिर भी मेरे जीवन के

श्रृंगार सृजन करने वाले

ये मेरे बचपन के साथी

मेरी इच्छा रखने वाले

छोटी होकर मैंने तुमको

उपदेश व्यर्थ ही दे डाले

निश्चित ही मुझसे भूल हुई

जो तुम पर यह बंधन डाले

यदि त्याग प्रेम का पूरक है

तो उभय पक्ष ही त्यागी हो

इक दूजे की इच्छाओं के

सहयोगी हो अनुरागी हो

मैने निश्चय ही स्वार्थ भाव से

प्रेरित होकर उपदेश दिए

वह तर्क बहुत ही थोड़े थे

जो अब तक मैंने पेश किये

सच है कि त्याग तुम्हे ही क्यों

हमको भी तो करना होगा

निज धर्म गवांकर भी तेरी

इच्छा मुझको रखना होगा

अब छोड़ विचार उचित-अनुचित

कुछ त्याग आज करना होगा

निज इष्टदेव के चरणों में

खुद को अर्पण करना होगा

प्रस्तुत हूँ आज तुम्हारे हित

पूरी कर लो इच्छा राजा

न कहना मुझे स्वार्थी अब

आ गले लगा लो हे राजा

ठहरो हे देवी! तनिक ठहरो

तुम प्रेम परीक्षा पास हुई

जो आग लगी थी सीने में

अब उस पर है बरसात हुई

बस यही भावना थी उर में

मम प्रिया समर्पण कर देती

खुद पर मेरा हक आज समझ कभी

वह सब कुछ अर्पण कर देती

मैं इतना नहीं अनाड़ी हूँ

जो ऐसा अत्याचार करूँ

दुनियां की बातें कौन करे

खुद की नज़रों में पाप करूँ

यह बात अलग है कि तेरे

जीवन में जहाँ मोड़ आए

वादा है उस चौराहे पर

तू आशीष को सदा खड़ा पाये

लखकर तेरा आदर्श आज

मैं वादा करती हूँ राजा

जीवन में कब भी चाहोगे

मैं मिलने आउंगी राजा

जब भी चाहो अर्पित हूँ

तन-मन जो कुछ है तेरा है

“तुम मेरी हो” “मैं तेरा हूँ”

अब अपना नया सवेरा है…..

सम्पूर्ण कविता पढ़ने के लिए आभार…….



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46 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रवीण दीक्षित के द्वारा
December 4, 2012

एक ऐसी सफल रचना जिसे पढ़ते ही रहने का मन हो रहा है …बहुत खूब…! आशीष जी कृपया हारी पोस्ट्स का भी अवलोकन करें लिंक: http://www.praveendixit.jagranjunction.com धन्यवाद !

    ashishgonda के द्वारा
    December 4, 2012

    आदरणीय मित्रजी! सादर अभिवादन. ब्लॉग पर प्रथम आगमन पर ह्रदय से स्वागत है. कविता पर समय देने के लिए आभार….. जल्दी ही समय मिलने पर पहुँचता हूँ. धन्यवाद.

mayankkumar के द्वारा
December 4, 2012

आपकी कलम में वाकई रोचकता, व सौम्यता है …. सधन्यवाद !!

    ashishgonda के द्वारा
    December 4, 2012

    आदरणीय मित्रजी! सादर अभिवादन. ब्लॉग पर प्रथम आगमन पर ह्रदय से स्वागत है. कविता पर समय देने के लिए आभार…..

Sushma Gupta के द्वारा
November 25, 2012

प्रिय आशीष जी, आपकी अभूतपूर्व कविता की रसधार -रुपी गंगा निरंतर बहती हुई प्रतीत होती है,जिसके वेग में पाठक भी डुबकियां लगाए बिना नहीं रह पायेगा,यही तो है ,काव्य की सहजता और कवी की पकड़……… बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति …..लिखते रहिये…..बहुत-बहुत आशीष …….

    ashishgonda के द्वारा
    November 25, 2012

    आदरणीय प्रणाम! कविता के जरूरत से ज्यादा प्रशंसा करने के लिए आभार. मैं आपकी हिंदी से बहुत प्रभावित हूँ, आशा है ऐसे ही उत्साहवर्धन भरी प्रतिक्रिया प्राप्त होती रहेगी. (काव्य की सहजता और कवी की पकड़) मैं कोई कवि नहीं हूँ. यदि आप फेसबुक पर हैं तो कृपया मुझे भी जुड़ने का मौका दें, आपकी अति महान दया होगी… ashish10gonda@gmail.com धन्यवाद.

    Sushma Gupta के द्वारा
    November 25, 2012

    आशीष जी,मैं फेस -बुक पर भी हूँ,पर समयाभाव के कारण नियमित नहीं आ पाती हूँ…फिर भी मेरी कुछ रचनाएँ फेस-बुक पर भी आपको मिलेंगी…कुमार बिश्व्वास के कालम में शायद मैंने आपको देखा है…… यदि जुड़ने की प्रक्रिया या लॉग इन में कोई समस्या हो तो आप लिखें ..

Santlal Karun के द्वारा
November 24, 2012

आदरणीय आशीष जी, सर्वप्रथम संवेदनात्मक कविता के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! द्वतीय, यह कविता कैशोर्य-भावुकता से प्रभावित तथा समाज के लिए असंगत-विसंगत संबंधों के अनावश्यक महिमा-मंडन की कविता है | ऐसा साहित्य सम्बंधित रचनाकार और उसके पाठकों या थियेटर-सिनेमा धर्मी प्रस्तोताओं और उसके मनोरंजन-प्रेमी दर्शकों के लिए तो ठीक हो सकता है, पर स्वस्थ समाज की संरचना में बाधक होता है | ऐसा मसाला आग की तरह फैलता है और समाज के माथे पर सवारी करता है | शीरी-फरहाद और लैला-मजनू के दास्तान इसी श्रेणी में आते हैं | ज़रा सोचिये कौन पिता अपनी ५-६ साल की बेटी की पढ़ाई-लिखाई की चिंता छोड़ उसके ५-६ साला प्रेमी को गले लगाएगा | आज फरहादों और मजनुओं से क्या यह पूछा जाना लाजिम नहीं है कि जब उनकी अपनी बेटी ५-६ साल की ही रहेगी, तभी उसके पढ़ाने-लिखाने और बड़ा करके योग्य बनाने की चिंता किए बिना वे उसके ५-६ वर्षीय प्रेमी को वह हवा देना शुरू कर देंगे, जिस हवा के बल पर वे स्वयं आग की तरह फैले और न जाने कितने युवा-युवतियों के तन-मन को विकृत करने तथा आत्म-ह्त्या की प्रेरणा दी | कितना अच्छा होता कवि-लेखक तथा रंगकर्मी समय और समाज के विकार-विरोधी एकनिष्ठ प्रेम के द्रष्टान्त-उपमान, कथा-कहानी आदि लेकर आते | कवि-लेखक नाम के जीवधारियों को मेरा विनम्र परामर्श है कि वे अपने युवा-उन्माद को अपनी भावी बेटी के भावी युवा-उन्माद की समस्या से जोड़कर देखने का दृष्टिकोण अपनाएँ और अपने ह्रदय में गोस्वामी तुलसीदास-जैसे विचारवान को करवटें लेने दें | तुलसी का नाम लेनेवाले पुराने ख्यालातों के और दकियानूसी कहे जाते हैं, किन्तु युग-युग से जो प्रेमोन्माद का ‘टाइफाइड’ चला आ रहा है, उसका ‘एंटीबायोटिक’ सिर्फ तुलसी और उनके जैसों के यहाँ ही मिलता है | इतना प्रलंब चक्कर काटने के बाद भी “अब अपना नया सवेरा है…..” के नाम पर आखिर उक्त कविता का समापन ” अब अपनी नई रात है !” के इस रूप क्यों हुआ — “लखकर तेरा आदर्श आज मैं वादा करती हूँ राजा जीवन में कब भी चाहोगे मैं मिलने आउंगी राजा जब भी चाहो अर्पित हूँ तन-मन जो कुछ है तेरा है “तुम मेरी हो” “मैं तेरा हूँ”” यहाँ यह तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है कि राधा और कृष्ण की परिपाटी हिन्दू-भावनाओं की पौराणिक उदात्तता है , जो मधुरोपासना के अनुयाइयों द्वारा मध्य काल में मंदिरों में भी प्रतिष्ठापित हो गई; किन्तु हाड़-मांस के मानवीय जीवन के वास्तविक धरातल पर उसका यथार्थ विकृत संबंधों को बढ़ावा देता है | आशीष जी, बुरा मत मानियेगा, क्षमा-प्रार्थी हूँ, ऐसे साहित्यकारों की पूरी भीड़ है और साहित्य का अम्बार भरा पड़ा है, जो प्रेमोन्माद को बढ़ावा देता है, पर ऐसे रचनाकारों और पाठकों को पुनर्विचार के साथ ऐसे साहित्य में अपना बेटा-बेटी खोजते हुए आगे बढ़ने का निवेदन करता हूँ |

    ashishgonda के द्वारा
    November 25, 2012

    आदरणीय! सादर अभिवादन. प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए कोटिशः आभार. आदरणीय यद्यपि आप मुझसे उम्र में बड़े हैं, अनुभवों में भी श्रेष्ठ हैं, तो आपकी हर बात मुझे कही ज्यादा अच्छी होगी. उत्तर-प्रतिउत्तर मुझे शोभा नहीं देता, फिर भी अपने विचार मात्र प्रकट कर रहा हूँ, धृष्टता क्षमा करें. मैं आपकी बातों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ. सबसे पहले तो आपका पूर्णतयः अभिप्राय नहीं समझ पा रहा हूँ, आपको शिकायत साहित्यकरों से है, या प्रेम से. दोनों बहुत अलग-अलग हैं. “प्रेम” बहुत पहुँचा हुआ शब्द हैं, परन्तु प्रेम करने वाले उतने पहुँचे हुए सभी नहीं होते. मानता हूँ 5-6 वर्ष की कन्या के माता-पिता ये सब नहीं सोंच सकते हैं, पर प्रेम करने में बुराई क्या है ? हाँ! प्रेम पूर्णतयः शुद्ध होना चाहिए. आज लोग केवल हवस को प्रेम समझने लगे हैं उसी कारण शुद्ध प्रेम भी बदनाम होता है. जहाँ तक मेरी विकार धारा है. तो “लखकर तेरा आदर्श आज मैं वादा करती हूँ राजा जीवन में कब भी चाहोगे मैं मिलने आउंगी राजा जब भी चाहो अर्पित हूँ तन-मन जो कुछ है तेरा है “तुम मेरी हो” “मैं तेरा हूँ” अब अपना नया सवेरा है….” मैं मानता हूँ एक शादीशुदा लड़की के लिए ये सब बिलकुल गलत है, परन्तु प्रेम की दृष्टि से गलत नहीं लगता. कल्पना कीजिये आपका बेटा है और वो आपका बहुत आदर करता है हर कुछ आपकी इच्छा से करना चाहता है, परन्तु उसे एक लड़की से प्यार हो गया, एक दिन उसने हिम्मत करके आपसे इस बारे में बात की. तो आप क्या करेंगे? सहर्ष अस्वीकार कर देंगे या उसका साथ देंगे? जरा सोंचिये जो लड़की उसके साथ शादी करेगी क्या वो कभी पूर्ण समर्पित हो पायेगी? क्या लड़का उसका उतनी देख भाल कर सकेगा जितनी की अपनी प्रेमिका की करता? शायद नहीं. क्योंकि केवल “तन मात्र के ही मेल से है मन भला मिलता कहीं, है बाह्य से बातों से कभी अन्तहकरण खिलता कहीं….” बस इसीलिए मैं प्रेम-विरोधी नहीं हूँ. वैसे मेरा अभी इस क्षेत्र में बिलकुल अनुभव नहीं हैं तो जो मन में आया लिखता गया. कविता की कमजोरी को मैं मानता हूँ, और सुझाव भरी प्रतिक्रिया के लिए पुनः आभार….. (कृपया अगर कोई दिल चुभती लगे तो तुरंत सूचित करें, मैं अपनी प्रतिक्रिया डिलीट करने को तैयार हूँ, परन्तु मार्गदर्शन करना न छोड़े.)

    Santlal Karun के द्वारा
    November 25, 2012

    आशीष जी, मेरी शिकायत न तो प्रेम से है और न ही साहित्यकारों से; हाँ, प्रेम-विकार को लेकर साहित्यकारों से यह अपेक्षा अवश्य है कि उनके साहित्य से समाज को सद्दिशा मिले; क्योंकि जीवन ही साहित्य का विषय है | साहित्य “पर उपदेश कुशल बहुतेरे” नहीं होना चाहिए | आप की उक्त कविता पढ़ता गया, अत्यंत प्रभावपूर्ण लगती गई; किन्तु अंत की पंक्तियों में जो निराशा हाथ लगी, उसी की प्रतिक्रिया मैंने व्यक्त की थी | ‘पति’ पति होता है, ‘प्रेमी’ प्रेमी होता है, यहाँ शुद्ध-अशुद्ध की बात लाकर गड्डम-गडड करना ठीक नहीं | ज़रा सोचिए, अगर आम भारतीय जीवन में किसी को यह पता चले कि उसकी पत्नी या विवाहित बहन या विवाहित बेटी का सम्बंधित ‘पति’ नाम के प्राणी के अलावा कोई ‘प्रेमी’ भी है, तो फिर वह चाहे कितना ही शुद्ध! विशुद्ध !! परिशुद्ध !!! हो, पारिवारिक जीवन में कितना कुछ खलल पैदा हो जाता है | और फिर ऐसी प्रेम-विसंगति को लेकर देश-दुनिया में हत्याओं-आत्महत्याओं की रोज-बरोज कितनी घटनाएँ हो रही हैं | इसलिए साहित्य, थियेटर, फिल्म आदि का सृजन-निर्माण मनोरंजन मात्र के लिए नहीं होना चाहिए, जैसा कि अधिकतर हो रहा है | मैं यही समझाना चाह रहा हूँ | आप की उक्त कविता में प्रेम की समस्या तो ठीक-ठाक उठाई गई, निदान भी देने की कोशिश की गई, पर अंत में जो “वह रूप कमल सी लगती थी/हो खिली कली ज्यों आज सुबह/बाबुल घर तीज मनाने को/प्रिय के घर से वह आयी थी”, उसके मुख से जो समाधान प्रस्तुत किया गया और कविता का अंत किया गया, वह आदि काल से दुनिया में यथार्थ की जमीन पर सम्बन्ध-विसंगति के कारण हो रही हत्याओं-आत्महत्याओं के हिसाब से कतई सटीक नहीं है | कोई भी प्रेम-कथा बुनते हुए याद रखिए– भारतीय जीवन में स्त्री के सिर्फ दो ही राजा मान्य हैं, ‘भैया राजा’ या ‘राजा सैंया’; तीसरे सारे राजों-महाराजों को भारतीय नारी ‘गीदड़’ ही समझे तभी उसके घर-परिवार के लिए शुभ है | इसलिए कविता के अंत में जो उस लड़की से ‘राजा’-वाजा का संबोधन दिलवाकर, फिर से इस रूप में नया सवेरा दिखा दिया गया, इस विसंगति के साथ अंत पर, इस प्रकार की अगली कविता लिखते समय यदि हो सके तो ध्यान रखिएगा — “मैं वादा करती हूँ राजा जीवन में कब भी चाहोगे मैं मिलने आउंगी राजा जब भी चाहो अर्पित हूँ तन-मन जो कुछ है तेरा है” आप ने ‘डिलीट’ की बात की है, ठीक नहीं; अंत छोड़ कर रचना मुझे बहुत अच्छी लगी; पर आप की इस झुंझलाहट से कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रतिक्रिया देकर मैं अपना समय नष्ट कर रहा !?

    ashishgonda के द्वारा
    November 26, 2012

    आदरणीय! मार्गदर्शन के लिए समय निकलने हेतु आभार. पिछली प्रतिक्रिया में शायद मैं आपका मंतव्य नहीं समझ सका, इसीलिए प्रतिउत्तर की भूल कर बैठा. आपने जिन पंक्तियों पर सहमति जताई है उन्ही पंक्तियों की असहमति से सहमत हूँ. अर्थात आपकी बात मानता हूँ, और अपनी गलती स्वीकार करता हूँ, संभव है आप अपना समय नष्ट कर रहे होंगे परन्तु मेरे लिए बहुत अच्छी बात है जो आपसे कुछ अच्छा सीखने को मिला. समय नष्ट करवाया इसके लिए भी क्षमा कीजियेगा. “डिलीट” की बात इस लिए की थी क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे अज्ञानता से किसी का भी अपमान हो. इसीलिए अपनी गलती सहर्ष स्वीकार करता हूँ, और आपको मार्गदर्शन के लिए पुनः धन्यवाद कहता हूँ. प्रणाम.

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
November 24, 2012

आशीष जी,प्रेम भाव की सुन्दर अभिव्यक्ति ,लगता है जैसे रचनाकार की आप बीती प्रेम कथा हो.कविता कुछ ज्यादा ही लम्बी हो गयी है.

    ashishgonda के द्वारा
    November 24, 2012

    आदरणीय! प्रणाम. प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से शुक्रिया. ये एक कपोल-कल्पना है और कुछ नहीं. कविता की लम्बाई के लिए क्षमा चाहता हूँ.

aman kumar के द्वारा
November 23, 2012

आदरणीय आशीष भाई !! सादर अभिवादन, कविता तो सच में बहुत लम्बी है लेकिन इसके लिए आप तारीफ के ही हकदार हैं. लम्बी होने के बाद भी कोई भी व्यक्ति इसे पढता ही जायेगा. ऐसा मुझे लगता है. सुन्दर भावों और गहराई के लिए बधाई.!

    ashishgonda के द्वारा
    November 23, 2012

    आदरणीय श्री अमन जी! हार्दिक अभिन्दन. प्रतिक्रिया और सराहना के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद. आशा है आपकी उम्मींद ठीक निकलेगी. प्रणाम.

Mohinder Kumar के द्वारा
November 23, 2012

आशीष जी, प्यार में ऐसा होता ही है…प्यार मिल जाये तब भी और न मिले तब भी.. टैन्शन नहीं लेने का. नर्म कोमल उद्गारों से सजी कविता के लिय बधाई… लिखते रहिये. मेरे हिसाब से इन सब बातों को कम शब्दों में कहते तो अधिक प्रभावी होता.. इसे अन्यथा न लें … महज सुझाव भर है…

    ashishgonda के द्वारा
    November 23, 2012

    आदरणीय! सादर, प्रतिक्रिया, सराहन और सुझाव के लिए बहुत बहुत धन्यवाद. अगर कम शब्दों में लिखना सीख गया तो कवि न बन जाता. हा हा हा! 

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
November 23, 2012

” तुम मेरी हो ” “मैं तेरा हूँ ” अब अपना नया सबेरा है !……… मन की कोमलतम मनोवृत्तियों व गर्म अहसासों का सुन्दर और श्लिष्ट संगम ! वाकई आप की इस अन्तरंग प्रेम – कथा ने मर्म को भेदकर अंतस्तल को छू लिया ! पता नहीं क्यों ? मुझे यहाँ ‘ मार्मिक ‘ शब्द उतना उपयुक्त नहीं लग रहा ! हो सकता है मैं गलत हूँ ! फिर भी विप्रलम्ब की उत्कृष्ट रचना है यह ! सुन्दर अति सुन्दर ! आशीष जी , बधाई !!

    ashishgonda के द्वारा
    November 23, 2012

    आदरणीय सादर प्रणाम. सर्वप्रथम प्रशंसा भरी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. मैं आपकी हिंदी से बहुत प्रभावित हूँ, कृपया मुझे भी सिखने का मौका दें. और ऐसे ही अवलोकन करते रहें. सही कहू तो मुझे सबसे ज्यादा दिक्कत “शीर्षक” चुनने में होती है, क्योंकि अधिकतर लोग पहले कोई विषय चुनते हैं फिर उस पर लेख या कविता लिखते हैं. पर मैं उल्टा करता हूँ पहले अपने दिल की बात लिखता हूँ फिर देखता हूँ कि प्रसंग क्या है? फिर शीर्षक बनाने का प्रयास करता हूँ. अभी सीख ही रहा हूँ तो गलती के लिए आशा है क्षमा कर देंगे. धन्यवाद.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
November 23, 2012

आदरणीय आशीष जी सादर अभिवादन, कविता तो सच में बहुत लम्बी है लेकिन इसके लिए आप तारीफ के ही हकदार हैं. लम्बी होने के बाद भी कोई भी व्यक्ति इसे पढता ही जायेगा. ऐसा मुझे लगता है. सुन्दर भावों और तारतम्यता के लिए बधाई. -तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

    ashishgonda के द्वारा
    November 23, 2012

    मित्र! प्रतिकार अभिवादन. प्रतिक्रिया और बधाई के लिए आभार. मैं जब लिखता हूँ तो पता नहीं रहता है क्या लिखना है कहाँ तक लिखना है. पर ये कविता लंबी हो गई. पूरा पढकर प्रतिक्रिया के लिए आभार. मुझे विश्वास है जो ये कविता पूरी नहीं पढ़ेगा और प्रतिक्रिया करते समय आपकी प्रतिक्रिया पर नज़र डालेगा वो दुबारा से ऊपर जाकर पूरा पढ़ेगा. धन्यवाद.

yogi sarswat के द्वारा
November 23, 2012

यद्यपि मैंने तेरी पीड़ा तुझसे ज्यादा महसूस किया तेरी हर एक मजबूरी में खुद को है मजबूर किया यदि अब भी यही चाहती हो मेरी राहें हो जाये जुदा यदि सचमुच सोंच रहती कायम तो सचमुच हम-तुम हुए जुदा फिर भी हम अपने जीवन में क्या एक दूजे को भूलेंगे सच कहती हो क्या तुम और हम अपनी यह इच्छा भूलेंगे तुम नारी हो तुझमे अनंत बलिदान त्याग है हिम्मत है आशीष जी , प्रथम मैं आपकी तारीफ करूँगा की आपने इतनी लम्बी रचना में अपना पूरा ज्ञान , पूरा रिद्हम दे दिया ! इतनी लम्बी कविता में शायद ही कहीं तारतम्य टूटा होगा ! विचारों की नदी , उस नदी से बड़ी लगती है जहां आपने उस कमसिन को देखा होगा ! बहुत बहुत बधाई , एक विशिष्ट और सार्थक रचना के लिए

    ashishgonda के द्वारा
    November 23, 2012

    आदरणीय प्रणाम. कविता की चुनिन्दा पंक्तियों को सम्मानित करने और प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आभार. कहीं कहीं तारतम्यता टूटी है उसके लिए क्षमा चाहूँगा. आपने नदी का तालमेल बड़े बढ़िया ढंग से किया है. पुनः आभार. (पिछली कविता “एक अधूरी प्रेम-कथा”) की तरह यह भी काल्पनिक है, उस आपने मुझे नदी किनारे देखा ये तो और भी काल्पनिक है)

Sonam Saini के द्वारा
November 23, 2012

कविता तो बड़ी लम्बी और भावो से परिपूर्ण लिखी है आपने आशीष भाई, लेकिन मुझे बस एक ही सवाल पूछना है कि इतनी शुद्ध हिंदी आपको आती कैसे है, :) आपकी कविता पहले दिन ही पढ़ ली थी….. मगर प्रतिक्रिया में टाइम लग गया……. आप इतने छोटे हो और इतने सारे भाव……. पढाई वडाही भी करते हो कि बस कविताये ही लिखते रहते हो . :) ( just kidding, not serious)……. :) वैसे लव स्टोरी सच्ची है कि ऐसे ही…………. :) बहुत सुन्दर कविता …………… keep it up …………

    ashishgonda के द्वारा
    November 23, 2012

    बहन सोनम जी! रोचक और सराहनिए प्रतिक्रिया के लिए आभार. सवाल मुझे भी पूंछना है कि आपको उर्दू कैसे आती है? मेरा घर या गाँव में कोई साहित्यिक माहौल नहीं था. न लखनऊ में जहाँ रहता हूँ वहाँ ही. इसीलिए मुझे कुछ भी सिखने इसी मंच पर आना पड़ता है, जहाँ आप जैसी चुलबुली भी मिलती है.( कविता काल्पनिक है अभी तक “लव” माता-पिता को छोड़कर किसी से हुआ नहीं इसीलिए “स्टोरी” बनी नहीं. माता-पिता से हुआ तो स्टोरी भी बनी. “सच्चा ईस्वर” जैसी कविता उसी की दें है आप इसी मंच पर मेरी पहली पोस्ट में पढ़ सकती हैं.) अगर बात पढाई की करे तो हर किसी को पढाई के दौरान थोडा रूककर मनोरंजन की आवश्यकता होती है. जहाँ सब लोग मनोरंजन के लिए किसी खेल का सहारा लेते हैं वही मैं अपना लैपटॉप खोलकर आपलोगों का सहारा लेता हूँ. कविता लिखना शौक है क्योंकि हिंदी मेरी माँ है. ये शौक बचपन से नहीं था हिंदी की महत्ता जानने के बाद हुआ. बस मेरा मनोरंजन भी हो जाता है और आप सब से मुलाक़ात कर कुछ नया सीख भी लेता हूँ.

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
November 22, 2012

प्रिय आशीषजी, सुंदर कविता,…आपने इस रचना के साथ जो अनुरोध ऊपर लिखा है वह शायद जरूरी ही था क्योंकि कविता में जिस तरह के भाव प्रस्तुत हुए हैं उसके लिए यह आवश्यक ही था।..बधाई..

    ashishgonda के द्वारा
    November 23, 2012

    आदरणीय ब्लॉग पर प्रथम आगमन शुभ है. प्रतिक्रिया और कविता की सराहना के लिए धन्यवाद.आशा है ऐसे ही अवलोकन करते रहेंगे. प्रणाम.

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 22, 2012

बेहतरीन रचना।

    ashishgonda के द्वारा
    November 22, 2012

    संक्षिप्त प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

bhanuprakashsharma के द्वारा
November 22, 2012

प्रिय आशीष, सुंदर रचना। छोटी उम्र के बावजूद लंबी कविता में लंबा अनुभव सामाहित। सुंदर भाव के लिए बधाई। 

    ashishgonda के द्वारा
    November 22, 2012

    आदरणीय!सादर अभिवादन. प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार…. कविता लंबी है अनुभव बिलकुल नहीं उम्र का दोष है. धन्यवाद.

sinsera के द्वारा
November 22, 2012

कमाल कविता लिखी है भाई आशीष जी, इतने छोटे से आप और इतनी लम्बी कविता..!!!! कहाँ से लाये इतने भाव..?? बहुत सुन्दर, बहुत सुन्दर… (पुनश्च..धर्मवीर भारती जी की “गुनाहों का देवता “याद आ गयी मुझे..)

    ashishgonda के द्वारा
    November 22, 2012

    आदरणीय दीदीजी! ब्लॉग पर प्रथम आगमन पर स्वागत है. प्रतिक्रिया हेतु समय के लिए कोटिशः आभार….. भाव आते हैं लाये नहीं जाते. आशा है अबलोकन करती रहेंगी. धन्यवाद.

November 20, 2012

आशीष भाई मार्मिक प्रेम को ह्रदय से संजोया है ,बहुत मधुर रचना दिल से लिखी है बधाई ,,,,,,,,,,,,,,,बस यूँ ही वक्त ठहर जाए इसलिए विचार उचित-अनुचित रोको अपनी इस इच्छा को मैं आँसू स्वयं पोंछ लुंगी भूलो मत हरि की इच्छा को सपनो का सपना रहने दो मत उसे यथार्थ बनाओ तुम जो प्रिया किसी की पत्नी है

    ashishgonda के द्वारा
    November 20, 2012

    आदरणीय! सादर अभिवादन. ब्लॉग पर प्रथम आगमन पर ह्रदय से स्वागत करता हूँ. प्रतिक्रिया और बधाई के लिए धन्यवाद. आशा है ऐसे ही अवलोकन करते रहेंगे. प्रणाम.

alkargupta1 के द्वारा
November 20, 2012

प्रिय आशीष ,तुम्हारी पूरी मार्मिक प्रेम कथा आद्योपांत पढ़ी ….. सुन्दर भाव संजोकर लिखी गयी है यह कविता शुभकामनाएं

    ashishgonda के द्वारा
    November 20, 2012

    आदरणीया! सादर प्रणाम. प्रतिक्रिया और शुभकामना के लिए ह्रदय से आभार…….. आशा है ऐसे ही अवलोकन करती रहेंगी. धन्यवाद.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
November 20, 2012

मेरे प्रिय सस्नेह पहली प्रतिक्रिया तो लुप्त हो गयी अल्मैजर रोगी हूँ विचार सरिता सुप्त हो गयी इतनी लम्बी कविता कभी न थी पढ़ी पढने पर सर की चुटिया खडी हो गयी सुन्दर भाव आपकी पीड़ा देखा जो ये गम रोक सका न अपने को ऑंखें हो गयी नम बधाई.

    ashishgonda के द्वारा
    November 20, 2012

    आदरणीय! सादर चरण स्पर्श.. दोबारा समय देने के लिए आभार. यह प्रतिक्रिया पहले की अपेक्षा अधिक दिल को छूती है. कविता की मार्मिकता पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद.

akraktale के द्वारा
November 20, 2012

आशीष जी             वाह क्या बात है बहुत सुन्दर कविता मै तो मंत्रमुग्ध सा पढता ही गया. इतनी सुन्दर मार्मिक रचना पर बधाई स्वीकार करें. मगर मुझे कही ऐसे विराम भी मिले जहां से इसको दो भाग बना कर प्रस्तुत किया जा सकता था ताकि कविता कि लम्बाई पढने वालों के लिए बाधा नहीं होती. सादर.

    ashishgonda के द्वारा
    November 20, 2012

    आदरणीय सादर अबिवादन. प्रतिक्रिया और बधाई के लिए हार्दिक धन्यवाद. मैं तो अज्ञानी हूँ पता नहीं कहाँ से दो भाग किया जाना चाहिए. इसीलिए पूरा एक साथ प्रकाशित कर दिया. सम्पूर्ण कविता पढ़ने के लिए आभार…….

nishamittal के द्वारा
November 19, 2012

तुम्हारी आदर्श प्रेम गाथा के रूप में एक महाकाव्य पढ़ा.इतनी लम्बी तारतम्य युक्त रचना और इतने छोटे तुम वाह बधाई.

    ashishgonda के द्वारा
    November 19, 2012

    प्रणाम माँ जी! प्रोत्साहन भरी प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभार………शीर्षक मन को छू गया.”एक आदर्श प्रेम-गाथा”

seemakanwal के द्वारा
November 19, 2012

बहुत भावपूर्ण रचना .हार्दिक धन्यवाद हमने देखि है इन आँखों की महकती खुशबु , हाथ से छुकर इसे रिश्तों का इलज़ाम न दो , सिर्फ अहसास है ये ,रूह से महसूस करो प्यार को प्यार ही रहने दो ,कोई नाम न दो . सादर

    ashishgonda के द्वारा
    November 19, 2012

    आदरणीया! सादर अभिनन्दन. प्रतिक्रिया के लिए कोटिशः आभार………. समय देकर पंक्तियों का मान बढ़ा दिया.

ashishgonda के द्वारा
November 26, 2012

आदरणीय! प्रणाम. दुबारा समय देने के लिए आभार. मैं भी फेसबुक पर आपको ढूंढ लिया है. मित्रता-अनुरोध भी भेजा है, जब भी समय मिले तो जोड़ने की कृपा करियेगा. धन्यवाद.


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