चलो कविता लिखें और मस्ती करें

"जब नहीं शब्द का ज्ञान मुझे, तो स्वागत वचन कहूँ कैसे, जब नहीं मानता मन मेरा, तो फिर खामोश रहूँ कैसे, इसलिए व्यर्थ शब्दों से ही खुद को अगात करता हूँ, नम्र ह्रदय से निज पन्ने पर आपका स्वागत करता हूँ..."

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एक अधूरी प्रेम-कथा

Posted On: 8 Oct, 2012 Others में

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मेरे कॉलेज की लड़की है

शायद मुझपे मरती है

मुझको भी प्यार है उससे शायद

पर क्या मैं हूँ उसके लायक

हूँ इसी संदेह के घेरे में

क्या कोई खूबी है मेरे में

पर खूबी से मतलब ही क्या

प्यार तो कमियों से भी होता है

उसको प्यार मेरी कमियों से हो

ऐसी तो उसमें कमी नहीं……….

आखिर वो लड़की ही क्यूँ

मेरे मन को भाती है

शायद मुझसे ही मिलने

सबसे पहले आ जाती है

आँखों से मिलती रहती है

बातों से ही कभी-कभी

हर पल ऐसा लगता है

ज्यों मिलके गई हो अभी-अभी………

जब शिक्षक कोई आकर मुझको

गुस्से में डाट लगाता है

चेहरा उसका उतर जाता

मानो दिल जल जाता है

जब करे प्रशंसा कोई मेरी

तो वो खुश हो जाती है

पहले मन में मुस्काती है

फिर हँसी रोक न पाती है

दिल की खुशियाँ होंठों पर आ

झूम-झूम मुस्काती है………..

वैसे तो वो है ही सुन्दर

गुस्से में सौंदर्य-समंदर

उस पर जब मुस्काती है

लाखों क़त्ल कर जाती है

लड़के सब उसके दीवाने

कहते किस्से अपने मनमाने

लेकिन अनुभव से कहता हूँ

मैं ही दिल में उसके रहता हूँ

लेकिन न जाने क्यों उससे

ये सब कहने से डरता हूँ ………..

गर आँखे नम हैं मेरी तो

उसकी भी आँखें हैं खारी

जितनी हलचल में दिल में

उसके दिल में उससे भारी

जाने कब अपने लब से बोलेगी

कब राज दिलों का खोलेगी……….

गलती तो मेरी भी है इसमें

पर है अपराधी वो भी

न मैं उससे कह पाता हूँ

न मुझसे वो ही……………

इसलिए अधूरा है अब तक

प्रेम का किस्सा मेरा

जाने कब आएगा मेरे

शांति वन में वसंत सवेरा

अब मैं केवल करूँ प्रतीक्षा

कभी तो दिल पिघेला तेरा

तेरे दिल का भी कोई दोष नहीं

दुनियांदारी का है पहरा

सब कुछ पीछे ही रह जाए

कभी तो आये वो वक्त सुनहरा……….

बहुत सुनी परिभाषा मैंने

प्रेम, मोहब्बत और कहानी,

दृश्य अचम्भा देखा मैंने

आँखें हँसत भरकर पानी

दुनियां भर की प्रेम-कथाएँ

जग-भर को है याद जुबानी………

कितनी भी कमी भरी हो

फिर भी कोई भा सकता है

सारे जग की पीड़ा लेकर

एक अकेला गा सकता है

प्यार अगर हो सच्चा तो

कोई जहर भी खा सकता है

प्यार भले हो संध्या से

पर उगता सूरज पा सकता है.

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60 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sushma Gupta के द्वारा
November 9, 2012

प्रिय आशीष शुभाशीष,प्यार भले हो संध्या से पर उगता सूरज पा सकता है.,आपने बिलकुल सही कहा है,असंभव होने पर भी प्यार में यदि दृड़ता है तो सफलता की मंजिल अवश्यही मिलेगी”|

    ashishgonda के द्वारा
    November 10, 2012

    आदरणीया! सादर प्रणाम. ब्लॉग पर प्रथम प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभार. आपने बात का समर्थन कर उसने जान डाल दी.

pritish1 के द्वारा
November 1, 2012

आपने अपनी वाली का जो वर्णन किया है जो शब्द चयन किये हैं और कविता में जो उनका प्रवाह है कोई भी लड़की देख ले तो आपको पाने की तमन्ना जरुर रखेगी………..!! प्रीतीश

    ashishgonda के द्वारा
    November 1, 2012

    मित्र! सादर अभिवादन, बहुत रोचक प्रतिक्रिया के लिए आभार….. जरूर रखती परन्तु आपने बता दिया कि एक पहले से ही है. तो सब काम बिगड़ गया. वैसे यह एक काल्पनिक कविता है ये बताते -बताते थक चुका हूँ.

akraktale के द्वारा
October 20, 2012

जब शिक्षक कोई आकर मुझको गुस्से में डाट लगाता है चेहरा उसका उतर जाता मानो दिल जल जाता है जब करे प्रशंसा कोई मेरी तो वो खुश हो जाती है पहले मन में मुस्काती है फिर हँसी रोक न पाती है दिल की खुशियाँ होंठों पर आ झूम-झूम मुस्काती है………..         ओय होय बहुत सुन्दर भाव. आशीष जी मै तो कहता हूँ लपक लो. सुन्दर रचना पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें.

    ashishgonda के द्वारा
    October 22, 2012

    आदरणीय! रोचक, सुन्दर सराहना भरी प्रतिक्रिया और बधाई के लिए ह्रदय से आभार…….

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 18, 2012

इतनी सुन्दर कविता के लिये चार पंतियां समर्पित हैं। भाषा सरल,सहज यह कविता, भावाव्यक्ति है अति सुन्दर। यह सच है सबके यौवन में, ऐसी कविता सबके अन्दर। कब लिख जाती कैसे लिखती, हमें न मालुम होता अकसर।

    ashishgonda के द्वारा
    October 18, 2012

    आदरणीय! सादर प्रणाम, मेरी कविता का तो पता नहीं, लेकिन आपकी प्रतिक्रिया स्वरुप कविता के लिए मेरे पास शब्द नहीं, आपकी कविता बहुत सुन्दर लगी. प्रतिक्रिय और कविता के लिए आभार………..

    jlsingh के द्वारा
    October 18, 2012

    बहुत खूब !

    ashishgonda के द्वारा
    October 19, 2012

    हार्दिक धन्यवाद.

yogi sarswat के द्वारा
October 17, 2012

आशीष जी, अगर मामला वाकई हलचल भरा है तो कदम सम्हाल के रखिये.. इस उम्र में बड़े भ्रम भी होते हैं.! ये संसार की सबसे कठिन डगर हैं…नयी राह मिल रही है आपको

    ashishgonda के द्वारा
    October 17, 2012

    आदरणीय! सादर अभिवादन, प्रतिक्रया हेतु समय देने के लिए आभार…… मैं तो पहले से ही एक राग अलाप रह हूँ, कि ये सब केवल एक कपोल-कल्पना है, निवेदन है ऐसे ही अवलोकन करते रहिएगा. नौ दिन की नवरात्रि पर हार्दिक शुभकामनाये.

alkargupta1 के द्वारा
October 17, 2012

प्रिय आशीष जी , सुन्दर शब्दों के साथ आपकी भावाभिव्यक्ति तो बहुत ही अच्छी है लेकिन एक जगह ज़हर खाने वाली बात मुझे कुछ अच्छी नहीं लगी ……. आपके शांति वन में बहुत शीघ्र ही वसंत सवेरा आने वाला है …… सकारात्मक सोच रखें …..भावनाएं बलबती होंगी……. शुभकामनाएं नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएं !!

    ashishgonda के द्वारा
    October 17, 2012

    आदरणीय ताई जी! सादर चरणस्पर्श, प्रतिक्रिया स्वरुप आशीष देने के लिए आभार…… जहर वाली बात कई लोगो ने आपत्ति जताई है, मैं अपनी गलती मानता हूँ, इससे कविता की भावना को ठेस पहुँच रहा है, आगे से अगर प्रेम लिखूंगा तो इन सब बातों का ध्यान रखूँगा और कोशिश करूँगा कि ये गलती दुबारा न हो, फिर भी अगर थोड़ी सी कमी दिखे तो उसे ज्यादा करके बताइयेगा ताकि सुधार सकूँ. मैं आप लोगो से ही सीख रहा हूँ, जो मेरे अंदर कमी न ढूंढ सके समझो उसके अंदर ही कमी है क्योंकि मैं तो कमियों का सागर हूँ उसमे से थोडा सा जल निकलना कौन सा कठिन काम है. पुनः आभार….. नवरात्रि पर माँ दुर्गा आपको दीर्घायु प्रदान करें, इसी कामना के साथ आपका आशीष पाने की प्रतीक्षा में- आशीष

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 15, 2012

गर आँखे नम हैं मेरी तो उसकी भी आँखें हैं खारी जितनी हलचल मेरे दिल में उसके दिल में उससे भारी… कमाल है युवावस्था का चुलबुलापन …. …सारे लक्षण बता रहे हैं की कुछ कुछ हो गया है ..ऐसा ही होता है जुबान खामोश रहती है फिर नयन बोलते हैं होंठ डोलते हैं कम्पन होता है और दिल के साज बज उठते हैं …आशीष जी खूबसूरत ..प्यार करो तुम संध्या से उगता सूरज नित पा जाओ …उस स्वर्णिम मधुरिम वेला में आनंद भरे नित चित बस जाओ … जय श्री राधे ..सब शुभ हो मनोकामना पूरी हो भ्रमर ५

    ashishgonda के द्वारा
    October 15, 2012

    आदरणीय!सादर प्रणाम, बहुत ही सुन्दर प्रतिक्रिया दिया है आपने, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कैसे आपका धन्यवाद करूँ. आपका जो आशय है वही सब लोग समझ रहे हैं, परन्तु ये सब केवल कपोल-कल्पना है. फिर भी आपका सहयोग मुझे कृतज्ञ कर रहा. ऐसे ही अवलोकन करते रहिएगा….

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 15, 2012

गुस्से में सौंदर्य-समंदर उस पर जब मुस्काती है लाखों क़त्ल कर जाती है लड़के सब उसके दीवाने कहते किस्से अपने मनमाने लेकिन अनुभव से कहता हूँ मैं ही दिल में उसके रहता हूँ….. बहुत ही सुंदर और प्यारी अभिव्यक्ति प्रिय आशीष जी ….. बधाई आपको बस जहर वाली बात थोड़ी सी नकरातम जा रही है उसके जगह पे कोई और शब्द इस्तेमाल करले तो बढ़िया रहेगा ..

    ashishgonda के द्वारा
    October 15, 2012

    आदरणीया! सादर प्रणाम, ब्लॉग पर प्रथम आगमन पर स्वागतम और धन्यवाद. प्रतिक्रिया, मार्गदर्शन और पंक्तियों को सम्मानित करने के लिए आभार…… ठीक कहा आपने अब मुझे भी लगता है कि वो पंक्तियाँ नकारात्मक प्रभाव डाल रहीं हैं, इसके बारे में मेरे आदरणीय गुरूजी (चातकजी) ने मुझे पहले ही कहा है, मैं आगे से इसका ध्यान रखूँगा, आशा है आप मेरे इस अपराध को क्षमा कर मेरे अन्य ब्लॉग का अवलोकन करती रहेंगी. एक बार पुनः आभार………

sudhajaiswal के द्वारा
October 15, 2012

प्रिय आशीष जी, जो आपके गुरु जी ने कहा वही बातें मै भी कहना चाहती थी | उन्होंने बिलकुल सही कहा, सुन्दर कविता सुन्दर भाव के लिए बहुत-बहुत बधाई!

    ashishgonda के द्वारा
    October 15, 2012

    आदरणीया! सादर चरणस्पर्श, ब्लॉग पर प्रथम आगमन पर स्वागतम और धन्यवाद. प्रशंसा भरी प्रतिक्रिया के लिए आभार……. आपने मेरे गुरूजी के वाक्य पर सहमति जताई, और उनकी भावनाओं को यहाँ भी रखा, मुझे ध्यान है मैंने जहर वाली पंक्ति गलत लिख थी, कबिता की भावना को ठेस पहुंची है. परन्तु आगे से ऐसी गलती न हो इसका ध्यान रखूँगा. आशा है आप मेरे इस जघन्य अपराध पर क्षमा कर मेरे अन्य ब्लॉग पर अपनी राय जताएंगी. प्रणाम.

aman kumar के द्वारा
October 15, 2012

अभिव्यक्ति , शब्द ,भाव सुंदर कविता ,

    ashishgonda के द्वारा
    October 15, 2012

    प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार……

chaatak के द्वारा
October 14, 2012

प्रिय आशीष जी, सर्वप्रथम आशीर्वाद! कविता निःसंदेह अच्छी है, भाव है, शब्द है, सुन्दर अभिव्यक्ति है, इन कोमल भावों की स्निग्धता अच्छी लगती है लेकिन ये जूनून गलत है “प्यार अगर हो सच्चा तो, कोई जहर भी खा सकता है”| प्रेम सिर्फ एक अहसास है इसमें ना तो कुछ खोना है न कुछ पाना है इसे अहसास तक ही रखना है|

    ashishgonda के द्वारा
    October 14, 2012

    आदरणीय गुरूजी!सादर चरणवंदन, सर्वप्रथम प्रतिक्रिया, सराहना और आशीष के लिए आभार…. आप ने मेरा मार्गदर्शन कर अपने सच्चे गुरु होने का प्रमाण दिया है. मैं अपनी गलती मानता हूँ ये मेरी पहली प्रेम-कविता थी वो भी काल्पनिक है, तो ये गलती हो गई आशा है आप क्षमा कर देंगे. आगे से अगर कभी प्रेम प्रसंग पर कविता लिखूंगा तो इसका ध्यान रखूँगा. एक निवेदन और है ऐसे ही मेरी अगले समस्त पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया चाहूँगा, मैं उचित माध्यम से आपको सूचित करता रहूँगा. पुनः आभार……

rekhafbd के द्वारा
October 14, 2012

कितनी भी कमी भरी हो फिर भी कोई भा सकता है सारे जग की पीड़ा लेकर एक अकेला गा सकता है प्यार अगर हो सच्चा तो कोई जहर भी खा सकता है प्यार भले हो संध्या से पर उगता सूरज पा सकता है.,अति सुंदर भाव लिए हुए कविता पर हार्दिक बधाई आशीष जी

    ashishgonda के द्वारा
    October 14, 2012

    आदरणीया! सादर, प्रतिक्रिया के लिए आभार…….. कविता की कुछ पंक्तियाँ को यहाँ लिखकर जो उसका सम्मान बढ़ाया उसके लिए धन्यवाद.

drvandnasharma के द्वारा
October 13, 2012

बहुत सुंदर कविता लिखी है आपने , ये प्यार ऐसी ही अजब कहानी है , लबो पे मुस्कान रहती और लबो पर पानी है .ये तो एक खुबसूरत एहसास है , इसे सब्दो में कहा बाँधा जा सकता है. लेकिन इज़हार करना भी ज़रूरी है और इकरार करना भी .

    ashishgonda के द्वारा
    October 13, 2012

    आदरणीया! सादर, प्रतिक्रिया के लिए कोटि सधन्यवाद. हर कोई मेरी कल्पना को वास्तविकता समझ रहे हैं, आपने मेरी कविता पर ध्यान केंद्रित किया और प्रेम को बढ़ावा दिया उसके लिए धन्यवाद. निवेदन है ऐसे ही अवलोकन करते रहिएगा.

vijay के द्वारा
October 12, 2012

कविता नहीं लगता है दिल की हालात कागज़ पर लिख दी है,पर प्रेम में नारी की इज्ज़त और अपनी पढाई का भी अवश्य ख्याल रखना सुंदर कविता के लिए बधाई

    ashishgonda के द्वारा
    October 12, 2012

    मान्यवर! प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. जैसा कि मैंने कई लोगो के उत्तर में कहा है ये सब एक कपोल-कल्पना है. जहाँ तक अपनी तरफ से हर क्षेत्र में नारी को सम्मान देने की कोशिश करता हूँ, आपके सुझाव अनमोल हैं अवश्य ध्यान रखूँगा.

bhanuprakashsharma के द्वारा
October 11, 2012

प्रेम की खूबसूरत अभिव्यक्ति, बधाई। 

    ashishgonda के द्वारा
    October 12, 2012

    आदरणीय! सादर, प्रतिक्रिया और बधाई के लिए आभार………

Santlal Karun के द्वारा
October 11, 2012

आशीष जी, भ्रान्ति के साथ आरम्भ इस प्रेम-कविता में जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं बादल छँटते जाते हैं और प्रेम की एकनिष्ठता एकाग्र होती जाती है | मुझे इस कविता की ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं– “बहुत सुनी परिभाषा मैंने प्रेम, मोहब्बत और कहानी, दृश्य अचम्भा देखा मैंने आँखें हँसत भरकर पानी दुनियां भर की प्रेम-कथाएँ जग-भर को है याद जुबानी………” पर “हँसत” क्या है ? टाइपिंग का दोष या यही क्रिया-रूप आप को उपयुक्त लगा, देख लीजिएगा |

    ashishgonda के द्वारा
    October 11, 2012

    आदरणीय! सादर,,,,, प्रतिक्रिया के लिए आभार…… पंक्तियों पर विशेष दृष्टि के लिए धन्यवाद. “हंसत” लिखना गलत टाइपिंग का दोष है वहाँ पर “हँसती” लिखना चाहता था. आगे से ध्यान रखूँगा….. पुनः आभार…………

vasudev tripathi के द्वारा
October 10, 2012

आशीष जी, अगर मामला वाकई हलचल भरा है तो कदम सम्हाल के रखिये.. इस उम्र में बड़े भ्रम भी होते हैं.! ये संसार की सबसे कठिन डगर हैं…

    ashishgonda के द्वारा
    October 11, 2012

    मान्यवर! सादर, सुझाव भरी प्रतिक्रिया के लिए आभार…….. जैसा कि मैंने भी कहा कि ये सब केवल कपोल-कल्पना है.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 10, 2012

सुन्दर श्रृंगार-गीत ! … बस थोड़ा मात्रा-वात्रा का ध्यान रखिये ! बाकी सब ठीक है ! बधाई !!

    ashishgonda के द्वारा
    October 11, 2012

    आदरणीय! सादर, गीत पसंद करने और प्रतिक्रिया करने के लिए आभार….

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
October 10, 2012

सुन्दर कविता आशीष जी.एक -दो जगह टाईपिंग की वजह से शब्द अधूरे रह गए हैं. जैसे……दिल पिघेला,आँखें हंसत, प्यार भले हो संध्या से पर उगता सूरज पा सकता है. बहुत सुन्दर.

    ashishgonda के द्वारा
    October 11, 2012

    आदरणीय! सादर प्रणाम, प्रतिक्रिया के लिए आभार….. जी हाँ! टाइपिंग की अशुद्धिय मैंने बाद में देखी इसीलिए अपडेट नहीं किया, आगे से पोस्ट करने से पहले ध्यान दूँगा. कविता को ध्यान से पढ़ने के लिए धन्यवाद. अवलोकन कर मार्गदर्शन करते रहिएगा.

seemakanwal के द्वारा
October 10, 2012

आशीषजी ग़ालिब का एक शेर यादआ गया – ये इश्क नहीं आसाँ बस इतना समझ लीजै , इक आग का दरिया है ,और डूब कर जाना है .

    ashishgonda के द्वारा
    October 10, 2012

    आदरणीया! सादर, प्रतिक्रिया हेतु समय देने के लिए आभार…..

अजय यादव के द्वारा
October 10, 2012

आशीष जी, सादर अभिवादन , पल्स कार्यक्रम में एम्स में आये डॉ कुमार विश्वास की एक कविता शेयर करना चाहूँगा – “कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है ! मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !! मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है ! ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !! मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है ! कभी कबिरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है !! यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं ! जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है !!”

    ashishgonda के द्वारा
    October 10, 2012

    मित्र! सादर, प्रतिक्रिय हेतु समय देने लिए आभार…….. मैं भी कुमार विश्वास जी की कवितायेँ बहुत पसंद करता हूँ, वो मेरे प्रिय कवि हैं, मेरे लैपटॉप में मुझसे ज्यादा उनकी तस्वीर हैं, उनकी कवितायेँ लिख कर भी रखता हूँ वीडियो भी. निवेदन है ऐसे ही अवलोकन करते रहिएगा.. पुनः आभार……..

nishamittal के द्वारा
October 10, 2012

वाह आशीष जी कल्पना इतनी खूबसूरत और पावन है तो वास्तविकता भी अपनी झलक दिखा रही है,बधाई अग्रिम दूं या …………

    ashishgonda के द्वारा
    October 10, 2012

    प्रणाम माँ जी! प्रतिक्रिया स्वरुप आशीष के लिए आभार……. आपने कविता को ढंग से समझा, आपकी अधूरी प्रतिक्रिया अपने में पूरी बात पूंछ रही है, फ़िलहाल अभी कोई ऐसा इरादा नहीं है, पहले पढ़-लिख कर उनके लिए कुछ कर सकूँ जिनके कारण मैं आज हूँ, फिर देखा जायेगा. निवेदन है ऐसे ही अवलोकन करते रहिएगा. पुनः आभार…….

Santosh Kumar के द्वारा
October 9, 2012

प्रिय श्री आशीष जी ,.सादर नमस्ते भाई यदि यह आपकी कल्पना है तो वास्तविकता कितनी खूबसूरत होगी इसका मूरख लोग सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं ,.. प्यार भले हो संध्या से पर उगता सूरज पा सकता है ,..अवश्य पायेगा बहुत सुन्दर सन्देश देने के लिए हार्दिक अभिनंदन ,..आप जैसे रचनाकार पर हमें गर्व है ,…बहुत बहुत बधाई

    ashishgonda के द्वारा
    October 10, 2012

    मान्यवर! मैं तो आपके प्यार देख ही गद्-गद् हूँ, प्रशंसा भरी प्रतिक्रिया के लिए आभार……आप जिसे मुरख कहते हैं, वास्तव में वो ही सबसे बुद्धिमान हैं, उनकी रचनाएँ और सोंच उसकी विद्वता प्रमाणित करती है. आपने मेरे ऊपर गर्व मेरा मान बढ़ा दिया है हार्दिक आभार…………

Dhavlima Bhishmbala के द्वारा
October 8, 2012

आशीष जी,सबसे पहले तो मैं आपसे क्षमा चाहती हूँ क्योंकि कुछ व्यस्तता के कारण मैं आपको समय नहीं दे पायी जैसा कि मैंने कहा था कि मैं आपके लेख,रचनाओं को अवश्य पढूंगी | आपकी ये कविता बहुत ही सुन्दर है और बहुत ही खूबसूरत भावों के साथ आपने अपनी भावनओं को परोसा है, आपको हार्दिक बधाई |

    ashishgonda के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीया! सादर, प्रंशंसा और प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. एक निवेदन है कि कृपया आगे से कभी क्षमा मांग कर शर्मिंदा मत करियेगा.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 8, 2012

हाँ यही प्यार है. बधाई, खूबसूरत रचना कम उम्र है जल्दी नहीं fansna

    ashishgonda के द्वारा
    October 8, 2012

    प्रणाम दादाजी! प्रतिक्रिया स्वरुप आशीष के लिए आभार…… सुझाव अच्छा है परन्तु मेरी कविता भी केवल एक कल्पना है, अभी ऐसा को इरादा है नहीं. निवेदन है अवलोकन करते रहिएगा.

drbhupendra के द्वारा
October 8, 2012

अति सुन्दर … लेकिन अब आप कह ही डालिए ………. बढ़िया …

    ashishgonda के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय डॉ. साहब! सादर, प्रतिक्रया के लिए आभार……. यह सब एक कपोल-कल्पना है.

    drbhupendra के द्वारा
    October 9, 2012

    देखिये कपोल कल्पना कह कर आप बात को टाल नहीं सकते है .. यदि आपकी हिम्मत न साथ दे रही हो तो मुझे बताइये ,मै आपका साथ दूंगा … हहाहहाहा…… मेरे भारतीय नारी विकासक्रम लेख के अगले भाग पर आप आमंत्रित है ..

    ashishgonda के द्वारा
    October 9, 2012

    आदरणीय! आपका दुबारा आगमन शुभ है, वैसे मैं सच कह रहा हूँ ये सब केवल एक कपोल-कल्पना है, पर आपका साथ देने का वादा अच्छा लगा, भूलिएगा मत आगे आवश्यकता पड़ सकती है, अपने अगले आलेख की जानकारी देने और आमंत्रित करने के लिए आभार……. जल्दी ही पहुँचने की कोशिश करूँगा

    shashibhushan1959 के द्वारा
    October 10, 2012

    चिरंजीवी आशीष जी, डाक्टर साहब की बातों में मेरी भी सहमती है ! शर्माइये मत, खुल कर कहिये !

    ashishgonda के द्वारा
    October 10, 2012

    आदरणीय! सादर चरणस्पर्श, आशीष और प्रतिक्रिया के लिए आभार…….. मैं सच-मुच झूंठ नहीं बोल रहा, अभी ऐसा कोई इरादा भी नहीं है, आपकी प्रतिक्रिया पढकर बहुत खुशी हुई, आशा है ऐसे ही स्नेह बनाये रखेंगे

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
October 8, 2012

आशीस भाई ,बहुत ही अच्छी प्रस्तुति आभार ,,,,,,,,,,बहुत सुनी परिभाषा मैंने प्रेम, मोहब्बत और कहानी, दृश्य अचम्भा देखा मैंने आँखें हँसत भरकर पानी दुनियां भर की प्रेम-कथाएँ जग-भर को है याद जुबानी……

    ashishgonda के द्वारा
    October 8, 2012

    आदरणीय! सादर,,, प्रशंसा भरी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. मैंने आपकी एक कविता पढ़ी “अमीरों की दिल्ली” सुन्दर और कटु सत्य बयां करती कविता है, वहाँ पर प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहा हूँ, अतः क्षमा करें.


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