चलो कविता लिखें और मस्ती करें

"जब नहीं शब्द का ज्ञान मुझे, तो स्वागत वचन कहूँ कैसे, जब नहीं मानता मन मेरा, तो फिर खामोश रहूँ कैसे, इसलिए व्यर्थ शब्दों से ही खुद को अगात करता हूँ, नम्र ह्रदय से निज पन्ने पर आपका स्वागत करता हूँ..."

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सीता-परित्याग, राजधर्म या राजमोह

Posted On: 20 Sep, 2012 Others में

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हरि अनंत हरि कथा अनंता! सुनहि-गुनहि बहुविधि सब संत!
कृपया इस लेख को पढ़ने से पहले इसे पढ़ें-
मानस के रचनाकार में भी पुरुष अहम् भारी
बंधुओं! जैसा कि आप सभी जानते हैं कि सीता-परित्याग रामायण की एक ऐसी घटना है जो आज तक विवादित है.
मैंने जिस कविता को पढ़ने के लिए लिंक दिया है, उसमें “श्रीरामचरितमानस” के रचनाकार पर अभिमानी होने का कलंक लगाया गया है. यहाँ थोड़ी देर के लिए एक बात साफ़ कर देना चाहूँगा, कि मेरा उद्देश्य किसी के विचारों का विरोध करना नहीं है, क्योंकि अध्यात्म के क्षेत्र में सभी अपना मत प्रस्तुत करते हैं.
सबसे पहले तो प्रश्न ये आता है कि गोस्वामी जी ने ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना किस उद्देश्य से की है और उसमे उन्होंने सीता-परित्याग की कथा का वर्णन क्यूँ नहीं किया?
उनका उद्देश्य जो भी रहा हो पर मुझे लगता है कि उनका उद्देश्य अपना अभिमान दिखाना या अपनी  काव्य-प्रतिभा से लोगो के मन पर अधिकार पाना या अपनी कविताओं से जीवन निर्वाह करना नहीं था. परन्तु इस बात पर उन्होंने प्रकाश डालते हुए खुद लिख है-
“स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा
भाषा निबन्धमतिमंजुलमातनोति”
तुलसीदास जी ने “श्रीरामचरितमानस” केवल अपने मानसिक सुख के लिए लिखा है, और वे हिंदी के एक मात्र ऐसे कवि हैं जिन्हें अपनी कविताओं में विश्राम मिला. “श्रीरामचरितमानस” में तीस मासपारायण और नौ नवाह्पारायण विश्राम हैं. मुझे ये भी नहीं पता कि उन्होंने किस कारण सीता-परित्याग की घटना को अपने ग्रन्थ में स्थान नहीं दिया, परन्तु दो एक कारण मेरे समझ में आ रहे हैं. पहला कारण तो ये हो सकता है कि उन्हें कोई इतिहास नहीं रचना था इसीलिए जहाँ तक उनकी अंतर-आत्मा ने उन्हें प्रेरित किया वहाँ तक की कथा उन्होंने लिख दिया. दूसरा कारण ये भी हो सकता है कि गोस्वामी जी को आगे की कथा का ज्ञान न रहा हो, उनके गुरुजी ने उन्हें न सुनाया हो. या तो यह भी हो सकता है कि जैसा की सभी जानते हैं उन्होंने ये कथा अपने बचपन में सुनी थी जिसके विषय में उन्होंने खुद लिख है-
“मैं पुनि निज गुर सन सुनी, कथा सों सूकर खेत
समुझी नहि तसि बालपन, तब अति रहेउँ अचेत”
और इससे उनके समझ में पूरी तरह न आया हो. एक बात और ध्यान्ताव्य है कि उन्होंने अपने सम्पूर्ण ग्रन्थ की कथा को महर्षि भरद्वाज और याज्ञवल्क संवाद के रूप में वर्णन किया है.
“जागबलिक जो कथा सुहाई, भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई
कहिहऊ सोइ संबाद बखानी, सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी.”
तो हो सकता है कि याज्ञवल्क जी ने ही भरद्वाज जी को सीता-परित्याग की कथा न सुनाई हो.
यहाँ ऐसे ही कई कारण इकठ्ठे हो रहें हैं यद्यपि किसी का प्रमाण नहीं है, तो फिर ऐसे में किसी एक कवि पर लांछन लगाना कैसे उचित होगा?
उन्होंने लव-कुश जन्म के विषय में केवल इतना कहा है-
“दुइ सुत सुन्दर सीता जाए
लव कुस वेद पुरानन्ह गाए
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर
हरि प्रतिबिंब मनहूँ अति सुन्दर”
इसके बाद की कथा उन्होंने नहीं लिखी है कि लव-कुश का जन्म राज महल में हुआ या जंगल मे. उन्होंने हर जगह राम को भगवान और सीता जी को भगवती की नज़रों से देखा है तथा कहीं भी अपना मत प्रस्तुत नहीं किया है सदा ही एक निष्पक्ष कवि कलाकार बने रहे. उसी कविता में जिसका मैंने लिंक दिया था, उन (तुलसीदास) पर महिलाओं को नीचा दिखाने का आरोप लगाया है. अगर उन्हें स्त्री जाति को नीचा दिखाना होता तो वे सबकी तरह अपने ग्रंथ का “श्रीगणेश” करते, लेकिन उन्होंने अपने ग्रन्थ की शुरुआत (”वर्णनामार्थसंघानाम रसानांछंदसामपि” अर्थात वर्ण, नाम, अर्थ,  रसों और छंदों को मंगल करने वाली सरस्वती देवी की मैं वंदना करता हूँ) से की है.
जहाँ एक ओर उन्हें सीता, कौशल्या सुमित्रा जैसी स्त्रियों का चरित्र पता चला वहीँ दूसरी ओर  कैकेई सुपर्नाखा जैसी स्त्रियाँ भी मिली.
जिससे विवश होकर उन्हें लिखना पड़ा-
“ढ़ोल गंवार सूद्र पशु नारी
सकल ताडना के अधिकारी”
यहाँ उन्होंने कोई बात गलत नहीं लिखी. ऐसे महान कवि के ऊपर बिना सोंचे समझे दोषरोपण करना अन्याय होगा. न तो उन्हें अपने पुरुष होने का अभिमान था न ही उनके सीता-परित्याग की घटना लिख देने से राम के सम्मान में कोई कमी आती.
अगर बात सीता-परित्याग की करें तो ये काफी विवादित प्रसंग हैं सब अपने अपने दृष्टिकोण से देखते हैं, पर मेरी समझ में ये नहीं आ रहा हैं कि, जिस धोबी ने माँ सीता के ऊपर कलंक लगाया, उसकी बातों को सुनकर राम ने अपने राजधर्म का पालम करते हुए सीता का त्याग कर दिया, तो चलो मान लिया कि वो राजधर्म के कारण उचित और आवश्यक था,  परन्तु उनके राज्य में कोई ऐसा कानून क्यों नहीं था जिसके अनुसार धोबी को दूसरे के ऊपर मिथ्यादोषरोपण करने का दण्ड दिया जा सकता? सीता परित्याग राजधर्म की दृष्टि से उचित था इसे राजमोह का नाम नहीं दिया जा सकता, क्योंकि सीता के जाने के बाद राम ने भी एक वनवासी का जीवन बिताया है. अगर वो चाहते तो अपने आपको राजधर्म की जंजीरों से मुक्त कर सकते थे परन्तु इससे उनके आदर्श राजा होने पर संदेह हो जाता. राम अपने जन्म से लेकर हर काम करते हुए मानव मात्र को आदर्श सिखाते रहे, जैसे सबसे पहले उन्होंने अपने पिता की बात मानकर मुनि विश्वामित्र के साथ वन जाकर एक आदर्श शिष्य बने और फिर चौदह वर्ष के लिए वन जाकर एक आदर्श पुत्र का मार्ग सीखाते रहे. फिर जब सीता का हरण हुआ तो उन्होंने कितने कठिनाइयों का सामना किया और सीता को मुक्त करके एक आदर्श पति का मार्ग सिखया और उधर सुग्रीव और विभीषण की सहायता करके एक आदर्श मित्र बने, लक्षमण और भरत के स्नेह की प्रशंसा करते हुए एक आदर्श भाई बने. फिर सीता का परित्याग करके एक आदर्श राजा बने जो अपनी प्रजा के लिए कुछ भी कर सकता है कुछ भी. एक राजा अपने राष्ट्र के लिए कैसे समर्पित रहता है इसका वो अनूठा उदहारण बने. जिसके लिए राजधर्म से बढ़कर और कोई धर्म नहीं न पति का न पिता का, क्योंकि जब एक साधारण इंसान राजमुकुट पहनकर राजा बनता है तो समझ लो वो अब सन्यासी हो गया उसका अपने व्यक्तिगत जीवन और व्यक्तिगत रिश्तों से नाता टूट गया. वही तो किया राजा राम ने, फिर इस पर उन्हें अन्यायी कहना कैसे उचित होगा? एक बात और है कि राम से सीता को अग्नि प्रवेश के लिए क्यूँ कहा, उनका उद्देश्य सीता की अग्नि-परीक्षा नहीं था उनका उद्देश्य अपनी असली सीता प्राप्त करना था और एक साधारण इंसान की पत्नी अगर छः मास तक किस पराये राज्य में रहकर आती है तो उसके साथ वो क्या बर्ताव करेगा वही राम ने किया, यहाँ भी उन्हें गलत कहना उचित नहीं.
“सीता प्रथम अनल महुँ राखी,
प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी”
इसमें संदेह नहीं कि धोबी ने माँ सीता के ऊपर मिथ्या कलंक लगाया परन्तु सीता की इस अग्नि परीक्षा को अयोध्या वालों के सामने सीता के सतीत्व के प्रमाण के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जा सकता था, क्योंकि उसे अयोध्यावालों ने नहीं देखा था.
दूसरी ओर हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि ये सब मात्र मानवीय लीला है.
फिर भी मैं प्रश्न करता हूँ, कि यदि राम ने अपने वंश की परम्पराओं का पालन करने के लिए सीता का परित्याग किया तो लोग इस पर वाद-विवाद करते हैं, परन्तु जब उन्ही राम ने केवल वंश के परमपराओं के पालन के लिए लक्षमण जी का परित्याग कर दिया इस पर सभी मौन क्यूँ बैठे हैं? अगर उन्होंने राजधर्म के पालन के लिए सीता का परित्याग किया और उसे लोग सीता के साथ किया गया अन्याय बताते हैं तो जब काल आया था तो उसने राम से कहा था कि आप मुझे वचन दो कि अगर कोई हमें बात करते हुए देख लेगा तो आप उसे मृत्यु दण्ड देंगे, और उसी समय दुर्वाशा जी आ गए थे जिसके कारण लक्षमण जी को अतिथि कक्ष तक जाना पड़ा और राम फिaर लक्षमण जी का परित्याग कर दिया.
राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं परन्तु जब लक्षमण जी को वीरघतिनी शक्ति लगी और वो मूर्छित हो गए तो स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने कहा-
“जौ जनतेउँ बन बंधु बिछोहू
पिता बचन मनतेऊ नहिं ओहूँ.”
अगर तब उनका भातृत्व प्रेम उनके पिता के वचन से महान था, तो फिर राजा राम ने अपने वचनों का पालन करने के लिए क्यों उस भाई का त्याग कर दिया जिसने सिर्फ अपने बड़े भाई के लिए अपने माता-पिता, पत्नी सबको छोड़ दिया, एक बार भी नहीं सोंचा कि दुनियां उन्हें एक आदर्श पति कहेगी या नहीं, दुनिया उन्हें एक आदर्श पुत्र की संज्ञा देगी या नहीं?
ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, मैंने ये लेख किसी की भावना को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं लिखा हैं, सभी तरह के विचारों का स्वागत कृपया खुलकर प्रतिक्रिया करें.

हरि अनंत हरि कथा अनंता! सुनहि-गुनहि बहुविधि सब संत!

कृपया इस लेख को पढ़ने से पहले इसे पढ़ें-

मानस के रचनाकार में भी पुरुष अहम् भारी

बंधुओं! जैसा कि आप सभी जानते हैं कि सीता-परित्याग रामायण की एक ऐसी घटना है जो आज तक विवादित है.

मैंने जिस कविता को पढ़ने के लिए लिंक दिया है, उसमें “श्रीरामचरितमानस” के रचनाकार पर अभिमानी होने का कलंक लगाया गया है. यहाँ थोड़ी देर के लिए एक बात साफ़ कर देना चाहूँगा, कि मेरा उद्देश्य किसी के विचारों का विरोध करना नहीं है, क्योंकि अध्यात्म के क्षेत्र में सभी अपना मत प्रस्तुत करते हैं.


सबसे पहले तो प्रश्न ये आता है कि गोस्वामी जी ने ‘श्रीरामचरितमानस’ की रचना किस उद्देश्य से की है और उसमे उन्होंने सीता-परित्याग की कथा का वर्णन क्यूँ नहीं किया?

उनका उद्देश्य जो भी रहा हो पर मुझे लगता है कि उनका उद्देश्य अपना अभिमान दिखाना या अपनी  काव्य-प्रतिभा से लोगो के मन पर अधिकार पाना या अपनी कविताओं से जीवन निर्वाह करना नहीं था. परन्तु इस बात पर उन्होंने प्रकाश डालते हुए खुद लिख है-

“स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा

भाषा निबन्धमतिमंजुलमातनोति”

तुलसीदास जी ने “श्रीरामचरितमानस” केवल अपने मानसिक सुख के लिए लिखा है, और वे हिंदी के एक मात्र ऐसे कवि हैं जिन्हें अपनी कविताओं में विश्राम मिला. “श्रीरामचरितमानस” में तीस मासपारायण और नौ नवाह्पारायण विश्राम हैं. मुझे ये भी नहीं पता कि उन्होंने किस कारण सीता-परित्याग की घटना को अपने ग्रन्थ में स्थान नहीं दिया, परन्तु दो एक कारण मेरे समझ में आ रहे हैं. पहला कारण तो ये हो सकता है कि उन्हें कोई इतिहास नहीं रचना था इसीलिए जहाँ तक उनकी अंतर-आत्मा ने उन्हें प्रेरित किया वहाँ तक की कथा उन्होंने लिख दिया. दूसरा कारण ये भी हो सकता है कि गोस्वामी जी को आगे की कथा का ज्ञान न रहा हो, उनके गुरुजी ने उन्हें न सुनाया हो. या तो यह भी हो सकता है कि जैसा की सभी जानते हैं उन्होंने ये कथा अपने बचपन में सुनी थी जिसके विषय में उन्होंने खुद लिख है-

“मैं पुनि निज गुर सन सुनी, कथा सों सूकर खेत

समुझी नहि तसि बालपन, तब अति रहेउँ अचेत”

और इससे उनके समझ में पूरी तरह न आया हो. एक बात और ध्यान्ताव्य है कि उन्होंने अपने सम्पूर्ण ग्रन्थ की कथा को महर्षि भरद्वाज और याज्ञवल्क संवाद के रूप में वर्णन किया है.

“जागबलिक जो कथा सुहाई, भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई

कहिहऊ सोइ संबाद बखानी, सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी.”

तो हो सकता है कि याज्ञवल्क जी ने ही भरद्वाज जी को सीता-परित्याग की कथा न सुनाई हो.

यहाँ ऐसे ही कई कारण इकठ्ठे हो रहें हैं यद्यपि किसी का प्रमाण नहीं है, तो फिर ऐसे में किसी एक कवि पर लांछन लगाना कैसे उचित होगा?

उन्होंने लव-कुश जन्म के विषय में केवल इतना कहा है-

“दुइ सुत सुन्दर सीता जाए

लव कुस वेद पुरानन्ह गाए

दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर

हरि प्रतिबिंब मनहूँ अति सुन्दर”

इसके बाद की कथा उन्होंने नहीं लिखी है कि लव-कुश का जन्म राज महल में हुआ या जंगल मे. उन्होंने हर जगह राम को भगवान और सीता जी को भगवती की नज़रों से देखा है तथा कहीं भी अपना मत प्रस्तुत नहीं किया है सदा ही एक निष्पक्ष कवि कलाकार बने रहे. उसी कविता में जिसका मैंने लिंक दिया था, उन (तुलसीदास) पर महिलाओं को नीचा दिखाने का आरोप लगाया है. अगर उन्हें स्त्री जाति को नीचा दिखाना होता तो वे सबकी तरह अपने ग्रंथ का “श्रीगणेश” करते, लेकिन उन्होंने अपने ग्रन्थ की शुरुआत (”वर्णनामार्थसंघानाम रसानांछंदसामपि” अर्थात वर्ण, नाम, अर्थ,  रसों और छंदों को मंगल करने वाली सरस्वती देवी की मैं वंदना करता हूँ) से की है.

जहाँ एक ओर उन्हें सीता, कौशल्या सुमित्रा जैसी स्त्रियों का चरित्र पता चला वहीँ दूसरी ओर  कैकेई सुपर्नाखा जैसी स्त्रियाँ भी मिली.

जिससे विवश होकर उन्हें लिखना पड़ा-

“ढ़ोल गंवार सूद्र पशु नारी

सकल ताडना के अधिकारी”

यहाँ उन्होंने कोई बात गलत नहीं लिखी. ऐसे महान कवि के ऊपर बिना सोंचे समझे दोषरोपण करना अन्याय होगा. न तो उन्हें अपने पुरुष होने का अभिमान था न ही उनके सीता-परित्याग की घटना लिख देने से राम के सम्मान में कोई कमी आती.

अगर बात सीता-परित्याग की करें तो ये काफी विवादित प्रसंग हैं सब अपने अपने दृष्टिकोण से देखते हैं, पर मेरी समझ में ये नहीं आ रहा हैं कि, जिस धोबी ने माँ सीता के ऊपर कलंक लगाया, उसकी बातों को सुनकर राम ने अपने राजधर्म का पालम करते हुए सीता का त्याग कर दिया, तो चलो मान लिया कि वो राजधर्म के कारण उचित और आवश्यक था,  परन्तु उनके राज्य में कोई ऐसा कानून क्यों नहीं था जिसके अनुसार धोबी को दूसरे के ऊपर मिथ्यादोषरोपण करने का दण्ड दिया जा सकता? सीता परित्याग राजधर्म की दृष्टि से उचित था इसे राजमोह का नाम नहीं दिया जा सकता, क्योंकि सीता के जाने के बाद राम ने भी एक वनवासी का जीवन बिताया है. अगर वो चाहते तो अपने आपको राजधर्म की जंजीरों से मुक्त कर सकते थे परन्तु इससे उनके आदर्श राजा होने पर संदेह हो जाता. राम अपने जन्म से लेकर हर काम करते हुए मानव मात्र को आदर्श सिखाते रहे, जैसे सबसे पहले उन्होंने अपने पिता की बात मानकर मुनि विश्वामित्र के साथ वन जाकर एक आदर्श शिष्य बने और फिर चौदह वर्ष के लिए वन जाकर एक आदर्श पुत्र का मार्ग सीखाते रहे. फिर जब सीता का हरण हुआ तो उन्होंने कितने कठिनाइयों का सामना किया और सीता को मुक्त करके एक आदर्श पति का मार्ग सिखया और उधर सुग्रीव और विभीषण की सहायता करके एक आदर्श मित्र बने, लक्षमण और भरत के स्नेह की प्रशंसा करते हुए एक आदर्श भाई बने. फिर सीता का परित्याग करके एक आदर्श राजा बने जो अपनी प्रजा के लिए कुछ भी कर सकता है कुछ भी. एक राजा अपने राष्ट्र के लिए कैसे समर्पित रहता है इसका वो अनूठा उदहारण बने. जिसके लिए राजधर्म से बढ़कर और कोई धर्म नहीं न पति का न पिता का, क्योंकि जब एक साधारण इंसान राजमुकुट पहनकर राजा बनता है तो समझ लो वो अब सन्यासी हो गया उसका अपने व्यक्तिगत जीवन और व्यक्तिगत रिश्तों से नाता टूट गया. वही तो किया राजा राम ने, फिर इस पर उन्हें अन्यायी कहना कैसे उचित होगा? एक बात और है कि राम से सीता को अग्नि प्रवेश के लिए क्यूँ कहा, उनका उद्देश्य सीता की अग्नि-परीक्षा नहीं था उनका उद्देश्य अपनी असली सीता प्राप्त करना था और एक साधारण इंसान की पत्नी अगर छः मास तक किस पराये राज्य में रहकर आती है तो उसके साथ वो क्या बर्ताव करेगा वही राम ने किया, यहाँ भी उन्हें गलत कहना उचित नहीं.

“सीता प्रथम अनल महुँ राखी,

प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी”

इसमें संदेह नहीं कि धोबी ने माँ सीता के ऊपर मिथ्या कलंक लगाया परन्तु सीता की इस अग्नि परीक्षा को अयोध्या वालों के सामने सीता के सतीत्व के प्रमाण के रूप में नहीं प्रस्तुत किया जा सकता था, क्योंकि उसे अयोध्यावालों ने नहीं देखा था.

दूसरी ओर हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि ये सब मात्र मानवीय लीला है.

फिर भी मैं प्रश्न करता हूँ, कि यदि राम ने अपने वंश की परम्पराओं का पालन करने के लिए सीता का परित्याग किया तो लोग इस पर वाद-विवाद करते हैं, परन्तु जब उन्ही राम ने केवल वंश के परमपराओं के पालन के लिए लक्षमण जी का परित्याग कर दिया इस पर सभी मौन क्यूँ बैठे हैं? अगर उन्होंने राजधर्म के पालन के लिए सीता का परित्याग किया और उसे लोग सीता के साथ किया गया अन्याय बताते हैं तो जब काल आया था तो उसने राम से कहा था कि आप मुझे वचन दो कि अगर कोई हमें बात करते हुए देख लेगा तो आप उसे मृत्यु दण्ड देंगे, और उसी समय दुर्वाशा जी आ गए थे जिसके कारण लक्षमण जी को अतिथि कक्ष तक जाना पड़ा और राम फिaर लक्षमण जी का परित्याग कर दिया.

राम मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते हैं परन्तु जब लक्षमण जी को वीरघतिनी शक्ति लगी और वो मूर्छित हो गए तो स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने कहा-

“जौ जनतेउँ बन बंधु बिछोहू

पिता बचन मनतेऊ नहिं ओहूँ.”

अगर तब उनका भातृत्व प्रेम उनके पिता के वचन से महान था, तो फिर राजा राम ने अपने वचनों का पालन करने के लिए क्यों उस भाई का त्याग कर दिया जिसने सिर्फ अपने बड़े भाई के लिए अपने माता-पिता, पत्नी सबको छोड़ दिया, एक बार भी नहीं सोंचा कि दुनियां उन्हें एक आदर्श पति कहेगी या नहीं, दुनिया उन्हें एक आदर्श पुत्र की संज्ञा देगी या नहीं?

ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, मैंने ये लेख किसी की भावना को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं लिखा हैं, सभी तरह के विचारों का स्वागत कृपया खुलकर प्रतिक्रिया करें.

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42 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

munish के द्वारा
November 23, 2012

प्रिय आशीष जी, पहली बार तुम्हारे ब्लॉग पर आया हूँ और एक साथ इस लेख से आगे तक के सभी लेख पढ़ लिए …….. वाकई बहुत अच्छा लिखते हो इसलिए आप बधाई के पात्र भी हो. इस लेख के माध्यम से आपने जो रामायण के प्रसंगों को समझाया वो भी काबिले तारीफ़ है. आपने एक प्रश्न किया है की मिथ्या दोषारोपण के लिए धोबी को सजा क्यों नहीं दी गयी या उस समय समय मिथ्या दोषारोपण के लिए की सजा की व्यवस्था क्यों नहीं थी. राम एक आदर्श राजा थे ……. उन्होंने अपने राजधर्म को अपनाते हुए धोबी द्वारा लगाए गए मिथ्या आरोप पर सीता को त्याग दिया, वास्तव में देखा जाए तो आरोप केवल धोबी ने लगाया लेकिन पूरी अयोध्या की प्रजा की उसमें मौन स्वीकृति थी यदि अयोध्या की प्रजा ने उसी समय उस धोबी के आरोपों का खंडन किया होता तो निश्चित ही दंड का भागी होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ अयोध्या की प्रजा ने उसके लगाए गए मिथ्या दोषों को मौन रह कर अपनी स्वीकृति दी, वास्तव में उस समय राम ने धोबी के आरोपों को प्रजा के आरोपों के रूप में देखा होगा ………. इसलिए धोबी को सजा नहीं दी लेकिन बाद में लव कुश के अयोध्या आगमन के पश्चात जब प्रजा की आँखों पर से पर्दा हटा तो स्वयं प्रजा ने ही धोबी को सजा दे दी एक बार फिर आपको अच्छे लेखन के लिए बधाई

    ashishgonda के द्वारा
    November 23, 2012

    आदरणीय! ब्लॉग पर प्रथम आगमन, सराहना भरी प्रतिक्रिया और बधाई के लिए कोटिशः आभार……. आपने मेरे प्रश्न का समुचित और संतुष्ट करने वाला उत्तर देकर मेरे ऊपर बहुत बड़ा यह्सान किया है. इसकी कीमत कोई मानस प्रेमी ही जान सकता है. एक बात का दुःख है की मैं आप जैसे विद्वान से इतनी देर में क्यों परिचित हुआ. बस यही निवेदन है इसी तरह अवलोकन करते रहिएगा, और आपका आशीष मुझे देते रहिएगा. सम्पूर्ण लेख पढ़ने के लिए पुनः आभार.

Manish Varshney के द्वारा
October 5, 2012

“ढ़ोल गंवार सूद्र पशु नारी सकल ताडना के अधिकारी” के बारे में सही द्रष्टिकोण के लिए पढें http://drbhupendra.jagranjunction.com/2012/09/25/%E0%A4%86%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B9-%E0%A4%A4%E0%A4%95-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0/

    ashishgonda के द्वारा
    October 5, 2012

    श्री मनीष जी! मार्गदर्शन के लिए आभार……. शायद आपने डॉ. साहब के आलेख पर प्रतिक्रिया करते हुए देखा होगा मैं पहले ही उनका आलेख पढ़ चूका हूँ…….. इस बारे में मैं वही उत्तर देना चाहूँगा जो मैंने अनिल कुमार “पंडित समीर” जी के प्रतिक्रिया दिया था. कृपया नीचे के प्रतिक्रियाओं में पढ़ लीजियेगा.

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
October 3, 2012

बहुत सुंदर आलेख,,बहुत ही अच्छे उदहारण बधाई,,,,

    ashishgonda के द्वारा
    October 4, 2012

    आदरणीय! सादर अभिनन्दन, सहमति और प्रशंसा भरी प्रतिक्रिया के लिए आभार…………

utkarshsingh के द्वारा
September 29, 2012

एक सुन्दर व तार्किक आलेख के लिए कोटिशः साधुवाद ! एक सामाजिक-धार्मिक विषय पर चर्चा करते हुए आपने मजबूती के साथ अपनी बात रखी पर विनम्रता को अंत तक नही छोड़ा इसके लिए बहुत-बहुत बधाई | यह एक ऐसा गुण है जो बहुतो में नहीं पाया जाता | शुभकामनाये !

    ashishgonda के द्वारा
    September 29, 2012

    मित्र! प्रातक्रिया और बधाई के लिए आभार…………… आप लोगो से मिली सीख ही मेरी विनम्रता बनकर आपके सामने आ गई है. ये सब आप लोगो की ही देन है. निवेदन है ऐसे ही अवलोकन करते रहिएगा.

drbhupendra के द्वारा
September 28, 2012

जो घटना इतिहास में घटित ही न हुई हो , उसे वर्णित करना किसी महत्त्व का नहीं है. इससे झूठ फ़ैलाने वालो को महत्त्व मिलता है.. मेरे लेख पर आमंत्रित है जिसका विषय भी यही है .

    ashishgonda के द्वारा
    September 29, 2012

    आदरणीय डॉ. साहब! प्रतिक्रिया के लिए आभार.. आपका आलेख पढ़ा, बहुत ही जानकारी देता आलेख लिखा है आपने, परन्तु मैं प्रतिक्रिया नहीं कर पा रहा हूँ, अतः क्षमा करें. ‘सीता-परित्याग नहीं हुआ था’ ऐसे प्रमाणन करती एक मासिक पत्रिका “राष्ट्रधर्म” मैंने बहुत पहले पढ़ी थी, परन्तु अभी संतुष्ट नहीं हो पा रहा हूँ.

pitamberthakwani के द्वारा
September 28, 2012

आशीष जी, आपके तर्कों के आगे हमें कहने को अब है ही नहीं, आपके शोध के लिए ,धन्यवाद!

    ashishgonda के द्वारा
    September 29, 2012

    आदरणीय! सादर, प्रतिक्रिया के लिए आभार…..मैंने जो भी लिखा है वो सब यहीं से सीखा रहा हूँ, केवल उसे अपने शब्दों में ढलने की कोशिश करता हूँ.

manoranjanthakur के द्वारा
September 28, 2012

आपको पहली वार पढ़ रहा हु आप ज्ञान के सागर है बहुत बधाई ….

    ashishgonda के द्वारा
    September 29, 2012

    आदरणीय! सुस्वागतम, प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. आपकी महानता पर मुग्ध हूँ.

yogi sarswat के द्वारा
September 25, 2012

आशीष जी , एक बात आपके लेखन से स्पष्ट हो रही है की जो लोग ये समझते हैं की हमारी नयी पीढ़ी में संस्कार नहीं रह गए हैं , उन्हें आपका लेखन आइना दिखता है ! आप जैसे नवयुवक अगर ऐसे विषय को अपना लेखन का केंद्रबनाते हैं तो सच में ख़ुशी होती है ! बहुत बहुत धन्यवाद ! मैं इस विषय के बारे में ज्यादा नहीं जानता , और ज्यादा ज्ञान भी नहीं है ! लेकिन आपके लेखन और आपकी शैली की प्रशंशा करता हूँ !

    ashishgonda के द्वारा
    September 25, 2012

    आदरणीय!सादर, सबसे पहले तो प्रशंसा और सराहना के लिए आभार…… वैसे तो मुझे भी कुछ बिशेष ज्ञान नहीं है परन्तु मेरे एक फूफा जी हैं जो मानस प्रवक्ता हैं उन्ही की प्रेरणा से मैं जब नौ वर्ष का था तभी से “श्रीरामचरितमानस” में रूचि लेने लगा. और तब से आज तक मैंने सात बार उनको पढ़ा है. तो कई सरे प्रश्न मन में आते गए उनका उत्तर मिलता गया कुछ फूफा जी से कुछ अन्य ज्ञानियों से. संस्कार की बात है तो वो सब यही से मिल रहा है माता-पिता की सीख और आपके लोगो के मार्गदर्शन ने कहा कि, गलत को गलत कहने में कोई बुरे नहीं. वैसे तो कटु सत्य नहीं बोलना चाहिए किन्तु कई बार आवश्यक हो जाता है. श्रीरामचरितमानस में एक प्रसंग आता है जब अंगद जी रावण के दरबार में संवाद कर रहे होते हैं तो रावण भगवन श्री राम को बहुत भला-बुरा काहता है, इस पर अंगद जी को बहुत क्रोध आता है जिसे कुछ इस तरह दर्शाया गया है- “हब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा, क्रोधवंत अति भयऊ कपिंदा. क्योंकि. हरि हर निंदा सुनई जो काना, होई पाप गोघात समाना. बस इसीलिए मैंने भी ये सब लिखा है. पुनः आभार………

vasudev tripathi के द्वारा
September 24, 2012

आशीष जी.! एक सुन्दर लेख के लिए हार्दिक बधाई| आपके विचारों से अत्यंत प्रसन्नता हुई| आपके सुन्दर भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनायें, आप धर्म व संस्कृति की सेवा के लिए सतत आगे बढ़ सकें|

    ashishgonda के द्वारा
    September 25, 2012

    मान्यवर! सादर, प्रतिक्रिया बधाई के लिए धन्यवाद. मेरे भविष्य को सवारने के लिए आपने जो आशीष दिया उसके लिए विशेष आभार……..

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
September 24, 2012

sundar vichar yukt lekh hetu badhai. priya aashish ji, sasneh प

    ashishgonda के द्वारा
    September 24, 2012

    प्रतिक्रिया और स्नेह के लिए आभार……

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
September 24, 2012

“जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन्ह तैसी” आशीष जी, सच तो यही है की प्रत्येक व्यक्ति अपने नज़रिए से दुनिया देखता है और अपने विचारों को ही सही ठहराने की कोशिशे भी करता है! आपकी समस्त बातों को छोड़कर मैं सिर्फ इस बात पर टिप्पड़ी करना चाहता हूँ, की ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी में….गंवार, शूद्र और नारी को पीटने का समर्थन किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता, वो भी ऐसे परिवेश में जबकि आपने स्वयं शूद्र और नारी को शिक्षा ग्रहण करने की अनुमति नहीं दी, जब आपने स्वयं उन्हें अज्ञानी और गंवार बने रहने पर मजबूर कर रक्खा है तो आप किस आधार पर उन्हें प्रताड़ित करने का समर्थन कर सकते हैं! हाँ ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जिसे समस्त प्रकार की छूट है, जिसे पढने-लिखने का अधिकार है, उसके बावजूद भी अगर उसका आचरण निकृष्ट कोटि का हो तो उसे प्रताड़ित करिए, फिर चाहे वो किसी भी वर्ग का हो….चाहे स्त्री हो या पुरुष हो!…….चित भी मेरी, पट भी मेरी का समर्थन करने वाली मानसिकता सरासर गलत है! दूसरी बात प्रताड़ित उन्हें करना चाहिए जो बिना किसी उचित आधार के किन्ही वर्ग विशेष के व्यक्तियों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं! http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/09/19/girlsvsboys/

    ashishgonda के द्वारा
    September 24, 2012

    आदरणीय! सादर अभिनन्दन. प्रतिक्रिया के लिए आभार…….. सही कहा आपने जिसकी जैसी दृष्टि है वो  वैसा देखता है. मैंने भी यही बात कहनी चाही थी सबसे पहले ही लिखा है, ”हरि अनंत हरि कथा अनंता! सुनहि-गुनहि बहुविधि सब संता”. जहाँ तक उन पंक्तियों के अर्थ को लेकर बात की जाय तो आपका मत भी सही है. और आदरणीय निशा मित्तल जी के एक प्रश्न लेख “एक जिज्ञासा छोटी सी” के उत्तर में श्री शंभू दयाल वाजपेयी जी का उत्तर बहुत सुन्दर और सटीक लगा है जिसमे उन्होंने लिखा है “- समुद्र और रावण दोनों ईश्‍वर की भी परवाह न करने वाले हैं। दोनों स्त्रियों के बारे में प्राय: एक सी बात कहते हैं। एक आत्‍म रक्षा में घबडा और गिडगिडा कर अपनी ही भर्त्‍सना करते हुए यह सोच कर कहता है कि शायद यह सुन कर मारने को अग्नि बाण ताने खडे श्री राम प्रशन्‍न हो जायें। वह कहता है – ढोल गंवार सूद्र पसु नारी , ये सब ताडन के अधिकारी। फिर स्‍पष्‍ट कर दूं कि यह कथन समुद्र का है। बचाव में आर्त समुद्र ( और, आरत काह न करै कुकर्मू) अपने बारे में कहता है- गगन समीर अनल जल धरनी, इनकै नाथ सहज जड करनी।” आप चाहें तो वो लेख पढ़ सकते हैं- http://nishamittal.jagranjunction.com/2010/09/28/%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%9B%E0%A5%8B%E0%A4%9F%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A5%80/

bhanuprakashsharma के द्वारा
September 23, 2012

आशीष जी काफी अध्ययन व परिश्रम से लिखा गया बेहतर लेख। बधाई। 

    ashishgonda के द्वारा
    September 23, 2012

    आदरणीय!सादर अभिवादन प्रतिक्रिया और बधाई के लिए आभार………..

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
September 22, 2012

प्रिय आशीष जी अच्छी विवेचना ..गोंडा ..अयोध्या का मर्म झलक उठा ….किसी चीज के लिखने का उस परिप्रेक्ष्य में कारण तो होता ही है उसे समझना जरुरी होता है केवल निंदा करना उचित नहीं है कभी उसी एक चीज के समर्थन में सराहना में भी तो लिखा जाता है …. सुन्दर … भ्रमर ५

    ashishgonda के द्वारा
    September 23, 2012

    आदरणीय! सादर प्रणाम, अच्छी बातों से की गईं प्रतिक्रिया के लिए आभार…….. निवेदन है ऐसे ही स्नेह बनाये रखियेगा.

Santlal Karun के द्वारा
September 22, 2012

आदरणीय वन्धु आशीष जी, मैंने आप का शोधात्मक आलेख देखा | श्रमसाध्य लेखन के लिए साधुवाद सहित आभार ! किन्तु किन्हीं विन्दुओं पर मेरी असहमति है — “ढ़ोल गंवार सूद्र पशु नारी | सकल ताडना के अधिकारी | यहाँ उन्होंने कोई बात गलत नहीं लिखी. ऐसे महान कवि के ऊपर बिना सोंचे समझे दोषरोपण करना अन्याय होगा. न तो उन्हें अपने पुरुष होने का अभिमान था न ही उनके सीता-परित्याग की घटना लिख देने से राम के सम्मान में कोई कमी आती. |” निश्चित ही गोस्वामी जी निरभिमानी भक्त कवि हैं और उनहोंने अपनी सामयिकता के अनुरूप ठीक ही लिखा होगा; पर आज उन पंक्तियों के हवाले से देश- दुनिया में फैली नारियों की आधी आबादी तथा युग-युग से दलित-पीड़ित जनता जनार्दन का अपमान क्या उचित होगा | नारियों और दलितों की काफी आबादी आधुनिक युग में पढ़-लिखकर आगे बढ़ी है तथा शेष वंचितों एवं आज के वनवासियों-गिरिवासियों में उत्थान की बयार पहुँचने लगी है | अतएव भाई मेरे ! इस विन्दु पर अर्थ निकालने की चलती-चली आ रही गुरु-गंभीर परम्परा से हटकर नवीन व आधुनिक समाज के लिए प्रासंगिक मंतव्य देने की नितांत आवश्यकता है | जहाँ तक सीता-परित्याग की बात है, तो यह घटित घटना और वाल्मीकि-तुलसी के काव्य-विवेक तथा उसकी आवश्यकता एवं सामयिकता की दृष्टि एवं अपेक्षित काव्य-यति-विन्दु पर निर्भर करता है | अंतत: नारियों और दलितों के समर्थन में अधुनातन विचारकों से नवीनता बोधी विचार का मेरा निवेदन है |

    ashishgonda के द्वारा
    September 22, 2012

    आदरणीय! सादर अभिनन्दन समर्थन भरी प्रतिक्रिया के लिए आभार……. जिन बिंदुओं पर आपने असहमति जताई है वो उचित है परन्तु गोस्वामी जी ने अपने समय के नारियों के लिए लिखा था जिसे गलत नहीं कहा जा सकता. इन पंक्तियों का एक सार्थक अर्थ मुझे अजय कुमार यादव जी प्रतिक्रिया मुझे अच्छी लगी है. आपकी असहमति से सहमत भी हूँ. उमींद है ऐसे ही मार्गदशर्न करते रहिएगा. एक बार पुनः आभार……..

shashibhushan1959 के द्वारा
September 22, 2012

मान्यवर आशीष जी, सादर ! आपके परिश्रम और आपकी भावना ने मुझे अभिभूत कर दिया ! बहुत बधाई ! सीता जी को अग्निपरीक्षा के लिए कहते हुए श्रीराम की मानसिक स्थिति क्या होगी, इसकी शायद किसी ने कल्पना नहीं की ! किस द्वंद्व से उन्हें गुजरना पडा होगा ! एक तरफ पत्नी, दूसरी तरफ मर्यादा का पालन ! ये लिखने का नहीं सोचने का विषय है !

    ashishgonda के द्वारा
    September 22, 2012

    आदरणीय! सादर चरण स्पर्श, सबसे पहले तो मैं आपको प्रशंसा, उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद देता हूँ. आपने एक अच्छी बात कही कि “ये लिखने नहीं सोंचने का विषय है”. पूर्णतयः सहमत. परन्तु आपसे एक शिकायत भी है जो आपने अपने पुत्र सामान भाई और मित्र के लिए मान्यवर शब्द का प्रयोग किया, यहाँ मुझे थोडा अनुचित लगा. आशा है ऐसे आशीष भरी प्रतिक्रिया देते रहेंगे. पुनः आभार…………… 

अजय यादव के द्वारा
September 22, 2012

बहुत ही सुंदर आलेख भाई बधाई हों|“ढ़ोल गंवार सूद्र पशु नारी सकल ताडना के अधिकारी” में ३ चीजे हैं -१]ढोल,२]गंवार सूद्र,३]पशु वत व्यवहार करने वाली नारी | [मेरे विचार से] बहुत सुंदर आलेख

    ashishgonda के द्वारा
    September 22, 2012

    मित्र! सादर अभिवादन, प्रतिक्रिया के लिए आभार,,,,, वैसे जहाँ तक मुझे पता है तो गोस्वामीजी ने केवल अपनी बात कविताओं में कहा था, उसके अर्थ का विवेचन अनेको विद्वानों ने मिलकर किया है. गोस्वामी जी ने ये पंक्तिय (“ढ़ोल गंवार सूद्र पशु नारी सकल ताडना के अधिकारी”) चाहे जिस उद्देश्य से लिखा था, पर आपकी विद्वता की दाद देता हूँ, आपके अर्थ से पूर्णतयः सहमत आपका भाई सामान मित्र आशीष

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
September 22, 2012

,बहुत ही खुबसूरतआलेख के लिये बधाई हो ,,,,,,,,,दूसरी ओर हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि ये सब मात्र मानवीय लीला है.

    ashishgonda के द्वारा
    September 22, 2012

    आदरणीय! सादर अभिनन्दन, प्रतिक्रिया और बधाई के लिए आभार………

Santosh Kumar के द्वारा
September 22, 2012

श्री आशीष जी ,..सादर बहुत शानदार विवेचना ,..शत शत अभिनन्दन ..पढ़कर मन आनंदित हो गया …कोटिशः आभार और हार्दिक बधाई

    ashishgonda के द्वारा
    September 22, 2012

    आदरणीय! सादर प्रणाम. समर्थन भरी प्रतिक्रिया और बधाई के लिए हार्दिक धन्यवाद. मुझे एक बात अच्छी नहीं लगी, जो आपने अभिनन्दन कहा, बड़ों का अभिनन्दन नहीं आशीष मिलना चाहिए. आपका पुत्र सामान भाई और मित्र आशीष

chaatak के द्वारा
September 21, 2012

जियो लाल! आपसे जो अपेक्षा थी वह आपने पूरी की| काश कि हमारे सभी साथियों की भावनाए आपकी तरह सकारात्मक और अपनी संस्कृति के लिए सम्मानजनक हो| जय हो !

    ashishgonda के द्वारा
    September 21, 2012

    आदरणीय गुरूजी! सादर प्रणाम. प्रतिक्रिया स्वरूप आशीर्वाद और समर्थन पाकर बहुत अच्छा लगा. मैंने जो कुछ आप लोगो से सीखा वही बात अपनी भाषा में कहने का प्रयास किया. एक बार पुनः आभार……….

vikramjitsingh के द्वारा
September 21, 2012

आप के विचार सराहनीय हैं…..आशीष जी…..

    ashishgonda के द्वारा
    September 21, 2012

    आदरणीय! प्रतिक्रिया के लिए आभार……..

nishamittal के द्वारा
September 21, 2012

आशीष तुम्हारी भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना सराहनीय है.कुछ विषय सभी धर्म ग्रंथों में ऐसे हैं,जिन पर मतभेद है,मतभेद होना कुछ अनुचित भी नहीं.परन्तु अपमान करना अनुचित है. तुमने किसी का अपमान नहीं किया बहुत पूर्व एक पोस्ट मैंने भी इस संदर्भ में लिखी “एक जिज्ञासा छोटी सी “उस पर मन पर सभी ब्लोगर्स ने प्रतिक्रिया व्यक्त की थी .तुम उनको पढ़ सकते हो .

    ashishgonda के द्वारा
    September 21, 2012

    प्रतिक्रिया और सराहना के लिए आभार, लोग माँ सीता का पक्ष लेकर भगवान श्री राम को अन्यायी राजा का नाम दे देते हैं ये तो उचित नहीं? इसीलिए ये पोस्ट लिखनी पड़ी. आपने अपने प्रतिक्रिया से लोगो को समझने में आसानी कर दी, इसके लिए आभार.


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