चलो कविता लिखें और मस्ती करें

"जब नहीं शब्द का ज्ञान मुझे, तो स्वागत वचन कहूँ कैसे, जब नहीं मानता मन मेरा, तो फिर खामोश रहूँ कैसे, इसलिए व्यर्थ शब्दों से ही खुद को अगात करता हूँ, नम्र ह्रदय से निज पन्ने पर आपका स्वागत करता हूँ..."

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Ashish Gonda


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सच्चे प्यार का सच्चा वादा

Posted On: 15 Jul, 2016  
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Hindi Sahitya कविता में

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सर अपना वो यूँ ही झुकाते नहीं हैं

Posted On: 9 Nov, 2015  
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अब तो तेरी यादें ही हैं….

Posted On: 19 Oct, 2014  
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तन्हाई मेरी प्रेमिका

Posted On: 7 Jan, 2014  
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आखिरी मर्तबा एक पल देखिये

Posted On: 1 Jul, 2013  
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तू मेरी लेखनी

Posted On: 28 Dec, 2012  
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आभार

Posted On: 12 Dec, 2012  
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एक मार्मिक प्रेम-कथा

Posted On: 19 Nov, 2012  
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एक अधूरी प्रेम-कथा

Posted On: 8 Oct, 2012  
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सीता-परित्याग, राजधर्म या राजमोह

Posted On: 20 Sep, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: D33P D33P

आदरणीय! मार्गदर्शन के लिए समय निकलने हेतु आभार. पिछली प्रतिक्रिया में शायद मैं आपका मंतव्य नहीं समझ सका, इसीलिए प्रतिउत्तर की भूल कर बैठा. आपने जिन पंक्तियों पर सहमति जताई है उन्ही पंक्तियों की असहमति से सहमत हूँ. अर्थात आपकी बात मानता हूँ, और अपनी गलती स्वीकार करता हूँ, संभव है आप अपना समय नष्ट कर रहे होंगे परन्तु मेरे लिए बहुत अच्छी बात है जो आपसे कुछ अच्छा सीखने को मिला. समय नष्ट करवाया इसके लिए भी क्षमा कीजियेगा. "डिलीट" की बात इस लिए की थी क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे अज्ञानता से किसी का भी अपमान हो. इसीलिए अपनी गलती सहर्ष स्वीकार करता हूँ, और आपको मार्गदर्शन के लिए पुनः धन्यवाद कहता हूँ. प्रणाम.

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

आशीष जी, मेरी शिकायत न तो प्रेम से है और न ही साहित्यकारों से; हाँ, प्रेम-विकार को लेकर साहित्यकारों से यह अपेक्षा अवश्य है कि उनके साहित्य से समाज को सद्दिशा मिले; क्योंकि जीवन ही साहित्य का विषय है | साहित्य “पर उपदेश कुशल बहुतेरे” नहीं होना चाहिए | आप की उक्त कविता पढ़ता गया, अत्यंत प्रभावपूर्ण लगती गई; किन्तु अंत की पंक्तियों में जो निराशा हाथ लगी, उसी की प्रतिक्रिया मैंने व्यक्त की थी | 'पति' पति होता है, 'प्रेमी' प्रेमी होता है, यहाँ शुद्ध-अशुद्ध की बात लाकर गड्डम-गडड करना ठीक नहीं | ज़रा सोचिए, अगर आम भारतीय जीवन में किसी को यह पता चले कि उसकी पत्नी या विवाहित बहन या विवाहित बेटी का सम्बंधित 'पति' नाम के प्राणी के अलावा कोई 'प्रेमी' भी है, तो फिर वह चाहे कितना ही शुद्ध! विशुद्ध !! परिशुद्ध !!! हो, पारिवारिक जीवन में कितना कुछ खलल पैदा हो जाता है | और फिर ऐसी प्रेम-विसंगति को लेकर देश-दुनिया में हत्याओं-आत्महत्याओं की रोज-बरोज कितनी घटनाएँ हो रही हैं | इसलिए साहित्य, थियेटर, फिल्म आदि का सृजन-निर्माण मनोरंजन मात्र के लिए नहीं होना चाहिए, जैसा कि अधिकतर हो रहा है | मैं यही समझाना चाह रहा हूँ | आप की उक्त कविता में प्रेम की समस्या तो ठीक-ठाक उठाई गई, निदान भी देने की कोशिश की गई, पर अंत में जो "वह रूप कमल सी लगती थी/हो खिली कली ज्यों आज सुबह/बाबुल घर तीज मनाने को/प्रिय के घर से वह आयी थी", उसके मुख से जो समाधान प्रस्तुत किया गया और कविता का अंत किया गया, वह आदि काल से दुनिया में यथार्थ की जमीन पर सम्बन्ध-विसंगति के कारण हो रही हत्याओं-आत्महत्याओं के हिसाब से कतई सटीक नहीं है | कोई भी प्रेम-कथा बुनते हुए याद रखिए-- भारतीय जीवन में स्त्री के सिर्फ दो ही राजा मान्य हैं, 'भैया राजा' या 'राजा सैंया'; तीसरे सारे राजों-महाराजों को भारतीय नारी ‘गीदड़’ ही समझे तभी उसके घर-परिवार के लिए शुभ है | इसलिए कविता के अंत में जो उस लड़की से 'राजा'-वाजा का संबोधन दिलवाकर, फिर से इस रूप में नया सवेरा दिखा दिया गया, इस विसंगति के साथ अंत पर, इस प्रकार की अगली कविता लिखते समय यदि हो सके तो ध्यान रखिएगा -- "मैं वादा करती हूँ राजा जीवन में कब भी चाहोगे मैं मिलने आउंगी राजा जब भी चाहो अर्पित हूँ तन-मन जो कुछ है तेरा है" आप ने ‘डिलीट’ की बात की है, ठीक नहीं; अंत छोड़ कर रचना मुझे बहुत अच्छी लगी; पर आप की इस झुंझलाहट से कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रतिक्रिया देकर मैं अपना समय नष्ट कर रहा !?

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय! सादर अभिवादन. प्रतिक्रिया और सुझाव के लिए कोटिशः आभार. आदरणीय यद्यपि आप मुझसे उम्र में बड़े हैं, अनुभवों में भी श्रेष्ठ हैं, तो आपकी हर बात मुझे कही ज्यादा अच्छी होगी. उत्तर-प्रतिउत्तर मुझे शोभा नहीं देता, फिर भी अपने विचार मात्र प्रकट कर रहा हूँ, धृष्टता क्षमा करें. मैं आपकी बातों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ. सबसे पहले तो आपका पूर्णतयः अभिप्राय नहीं समझ पा रहा हूँ, आपको शिकायत साहित्यकरों से है, या प्रेम से. दोनों बहुत अलग-अलग हैं. "प्रेम" बहुत पहुँचा हुआ शब्द हैं, परन्तु प्रेम करने वाले उतने पहुँचे हुए सभी नहीं होते. मानता हूँ 5-6 वर्ष की कन्या के माता-पिता ये सब नहीं सोंच सकते हैं, पर प्रेम करने में बुराई क्या है ? हाँ! प्रेम पूर्णतयः शुद्ध होना चाहिए. आज लोग केवल हवस को प्रेम समझने लगे हैं उसी कारण शुद्ध प्रेम भी बदनाम होता है. जहाँ तक मेरी विकार धारा है. तो "लखकर तेरा आदर्श आज मैं वादा करती हूँ राजा जीवन में कब भी चाहोगे मैं मिलने आउंगी राजा जब भी चाहो अर्पित हूँ तन-मन जो कुछ है तेरा है “तुम मेरी हो” “मैं तेरा हूँ” अब अपना नया सवेरा है…." मैं मानता हूँ एक शादीशुदा लड़की के लिए ये सब बिलकुल गलत है, परन्तु प्रेम की दृष्टि से गलत नहीं लगता. कल्पना कीजिये आपका बेटा है और वो आपका बहुत आदर करता है हर कुछ आपकी इच्छा से करना चाहता है, परन्तु उसे एक लड़की से प्यार हो गया, एक दिन उसने हिम्मत करके आपसे इस बारे में बात की. तो आप क्या करेंगे? सहर्ष अस्वीकार कर देंगे या उसका साथ देंगे? जरा सोंचिये जो लड़की उसके साथ शादी करेगी क्या वो कभी पूर्ण समर्पित हो पायेगी? क्या लड़का उसका उतनी देख भाल कर सकेगा जितनी की अपनी प्रेमिका की करता? शायद नहीं. क्योंकि केवल "तन मात्र के ही मेल से है मन भला मिलता कहीं, है बाह्य से बातों से कभी अन्तहकरण खिलता कहीं...." बस इसीलिए मैं प्रेम-विरोधी नहीं हूँ. वैसे मेरा अभी इस क्षेत्र में बिलकुल अनुभव नहीं हैं तो जो मन में आया लिखता गया. कविता की कमजोरी को मैं मानता हूँ, और सुझाव भरी प्रतिक्रिया के लिए पुनः आभार..... (कृपया अगर कोई दिल चुभती लगे तो तुरंत सूचित करें, मैं अपनी प्रतिक्रिया डिलीट करने को तैयार हूँ, परन्तु मार्गदर्शन करना न छोड़े.)

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

आदरणीय आशीष जी, सर्वप्रथम संवेदनात्मक कविता के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! द्वतीय, यह कविता कैशोर्य-भावुकता से प्रभावित तथा समाज के लिए असंगत-विसंगत संबंधों के अनावश्यक महिमा-मंडन की कविता है | ऐसा साहित्य सम्बंधित रचनाकार और उसके पाठकों या थियेटर-सिनेमा धर्मी प्रस्तोताओं और उसके मनोरंजन-प्रेमी दर्शकों के लिए तो ठीक हो सकता है, पर स्वस्थ समाज की संरचना में बाधक होता है | ऐसा मसाला आग की तरह फैलता है और समाज के माथे पर सवारी करता है | शीरी-फरहाद और लैला-मजनू के दास्तान इसी श्रेणी में आते हैं | ज़रा सोचिये कौन पिता अपनी ५-६ साल की बेटी की पढ़ाई-लिखाई की चिंता छोड़ उसके ५-६ साला प्रेमी को गले लगाएगा | आज फरहादों और मजनुओं से क्या यह पूछा जाना लाजिम नहीं है कि जब उनकी अपनी बेटी ५-६ साल की ही रहेगी, तभी उसके पढ़ाने-लिखाने और बड़ा करके योग्य बनाने की चिंता किए बिना वे उसके ५-६ वर्षीय प्रेमी को वह हवा देना शुरू कर देंगे, जिस हवा के बल पर वे स्वयं आग की तरह फैले और न जाने कितने युवा-युवतियों के तन-मन को विकृत करने तथा आत्म-ह्त्या की प्रेरणा दी | कितना अच्छा होता कवि-लेखक तथा रंगकर्मी समय और समाज के विकार-विरोधी एकनिष्ठ प्रेम के द्रष्टान्त-उपमान, कथा-कहानी आदि लेकर आते | कवि-लेखक नाम के जीवधारियों को मेरा विनम्र परामर्श है कि वे अपने युवा-उन्माद को अपनी भावी बेटी के भावी युवा-उन्माद की समस्या से जोड़कर देखने का दृष्टिकोण अपनाएँ और अपने ह्रदय में गोस्वामी तुलसीदास-जैसे विचारवान को करवटें लेने दें | तुलसी का नाम लेनेवाले पुराने ख्यालातों के और दकियानूसी कहे जाते हैं, किन्तु युग-युग से जो प्रेमोन्माद का 'टाइफाइड' चला आ रहा है, उसका 'एंटीबायोटिक' सिर्फ तुलसी और उनके जैसों के यहाँ ही मिलता है | इतना प्रलंब चक्कर काटने के बाद भी "अब अपना नया सवेरा है….." के नाम पर आखिर उक्त कविता का समापन " अब अपनी नई रात है !" के इस रूप क्यों हुआ -- "लखकर तेरा आदर्श आज मैं वादा करती हूँ राजा जीवन में कब भी चाहोगे मैं मिलने आउंगी राजा जब भी चाहो अर्पित हूँ तन-मन जो कुछ है तेरा है “तुम मेरी हो” “मैं तेरा हूँ”" यहाँ यह तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है कि राधा और कृष्ण की परिपाटी हिन्दू-भावनाओं की पौराणिक उदात्तता है , जो मधुरोपासना के अनुयाइयों द्वारा मध्य काल में मंदिरों में भी प्रतिष्ठापित हो गई; किन्तु हाड़-मांस के मानवीय जीवन के वास्तविक धरातल पर उसका यथार्थ विकृत संबंधों को बढ़ावा देता है | आशीष जी, बुरा मत मानियेगा, क्षमा-प्रार्थी हूँ, ऐसे साहित्यकारों की पूरी भीड़ है और साहित्य का अम्बार भरा पड़ा है, जो प्रेमोन्माद को बढ़ावा देता है, पर ऐसे रचनाकारों और पाठकों को पुनर्विचार के साथ ऐसे साहित्य में अपना बेटा-बेटी खोजते हुए आगे बढ़ने का निवेदन करता हूँ |

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

बहन सोनम जी! रोचक और सराहनिए प्रतिक्रिया के लिए आभार. सवाल मुझे भी पूंछना है कि आपको उर्दू कैसे आती है? मेरा घर या गाँव में कोई साहित्यिक माहौल नहीं था. न लखनऊ में जहाँ रहता हूँ वहाँ ही. इसीलिए मुझे कुछ भी सिखने इसी मंच पर आना पड़ता है, जहाँ आप जैसी चुलबुली भी मिलती है.( कविता काल्पनिक है अभी तक "लव" माता-पिता को छोड़कर किसी से हुआ नहीं इसीलिए "स्टोरी" बनी नहीं. माता-पिता से हुआ तो स्टोरी भी बनी. "सच्चा ईस्वर" जैसी कविता उसी की दें है आप इसी मंच पर मेरी पहली पोस्ट में पढ़ सकती हैं.) अगर बात पढाई की करे तो हर किसी को पढाई के दौरान थोडा रूककर मनोरंजन की आवश्यकता होती है. जहाँ सब लोग मनोरंजन के लिए किसी खेल का सहारा लेते हैं वही मैं अपना लैपटॉप खोलकर आपलोगों का सहारा लेता हूँ. कविता लिखना शौक है क्योंकि हिंदी मेरी माँ है. ये शौक बचपन से नहीं था हिंदी की महत्ता जानने के बाद हुआ. बस मेरा मनोरंजन भी हो जाता है और आप सब से मुलाक़ात कर कुछ नया सीख भी लेता हूँ.

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

प्रिय आशीष जी, पहली बार तुम्हारे ब्लॉग पर आया हूँ और एक साथ इस लेख से आगे तक के सभी लेख पढ़ लिए ........ वाकई बहुत अच्छा लिखते हो इसलिए आप बधाई के पात्र भी हो. इस लेख के माध्यम से आपने जो रामायण के प्रसंगों को समझाया वो भी काबिले तारीफ़ है. आपने एक प्रश्न किया है की मिथ्या दोषारोपण के लिए धोबी को सजा क्यों नहीं दी गयी या उस समय समय मिथ्या दोषारोपण के लिए की सजा की व्यवस्था क्यों नहीं थी. राम एक आदर्श राजा थे ....... उन्होंने अपने राजधर्म को अपनाते हुए धोबी द्वारा लगाए गए मिथ्या आरोप पर सीता को त्याग दिया, वास्तव में देखा जाए तो आरोप केवल धोबी ने लगाया लेकिन पूरी अयोध्या की प्रजा की उसमें मौन स्वीकृति थी यदि अयोध्या की प्रजा ने उसी समय उस धोबी के आरोपों का खंडन किया होता तो निश्चित ही दंड का भागी होता लेकिन ऐसा नहीं हुआ अयोध्या की प्रजा ने उसके लगाए गए मिथ्या दोषों को मौन रह कर अपनी स्वीकृति दी, वास्तव में उस समय राम ने धोबी के आरोपों को प्रजा के आरोपों के रूप में देखा होगा .......... इसलिए धोबी को सजा नहीं दी लेकिन बाद में लव कुश के अयोध्या आगमन के पश्चात जब प्रजा की आँखों पर से पर्दा हटा तो स्वयं प्रजा ने ही धोबी को सजा दे दी एक बार फिर आपको अच्छे लेखन के लिए बधाई

के द्वारा: munish munish

यद्यपि मैंने तेरी पीड़ा तुझसे ज्यादा महसूस किया तेरी हर एक मजबूरी में खुद को है मजबूर किया यदि अब भी यही चाहती हो मेरी राहें हो जाये जुदा यदि सचमुच सोंच रहती कायम तो सचमुच हम-तुम हुए जुदा फिर भी हम अपने जीवन में क्या एक दूजे को भूलेंगे सच कहती हो क्या तुम और हम अपनी यह इच्छा भूलेंगे तुम नारी हो तुझमे अनंत बलिदान त्याग है हिम्मत है आशीष जी , प्रथम मैं आपकी तारीफ करूँगा की आपने इतनी लम्बी रचना में अपना पूरा ज्ञान , पूरा रिद्हम दे दिया ! इतनी लम्बी कविता में शायद ही कहीं तारतम्य टूटा होगा ! विचारों की नदी , उस नदी से बड़ी लगती है जहां आपने उस कमसिन को देखा होगा ! बहुत बहुत बधाई , एक विशिष्ट और सार्थक रचना के लिए

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय ताई जी! सादर चरणस्पर्श, प्रतिक्रिया स्वरुप आशीष देने के लिए आभार...... जहर वाली बात कई लोगो ने आपत्ति जताई है, मैं अपनी गलती मानता हूँ, इससे कविता की भावना को ठेस पहुँच रहा है, आगे से अगर प्रेम लिखूंगा तो इन सब बातों का ध्यान रखूँगा और कोशिश करूँगा कि ये गलती दुबारा न हो, फिर भी अगर थोड़ी सी कमी दिखे तो उसे ज्यादा करके बताइयेगा ताकि सुधार सकूँ. मैं आप लोगो से ही सीख रहा हूँ, जो मेरे अंदर कमी न ढूंढ सके समझो उसके अंदर ही कमी है क्योंकि मैं तो कमियों का सागर हूँ उसमे से थोडा सा जल निकलना कौन सा कठिन काम है. पुनः आभार..... नवरात्रि पर माँ दुर्गा आपको दीर्घायु प्रदान करें, इसी कामना के साथ आपका आशीष पाने की प्रतीक्षा में- आशीष

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

आदरणीय!सादर, सबसे पहले तो प्रशंसा और सराहना के लिए आभार...... वैसे तो मुझे भी कुछ बिशेष ज्ञान नहीं है परन्तु मेरे एक फूफा जी हैं जो मानस प्रवक्ता हैं उन्ही की प्रेरणा से मैं जब नौ वर्ष का था तभी से "श्रीरामचरितमानस" में रूचि लेने लगा. और तब से आज तक मैंने सात बार उनको पढ़ा है. तो कई सरे प्रश्न मन में आते गए उनका उत्तर मिलता गया कुछ फूफा जी से कुछ अन्य ज्ञानियों से. संस्कार की बात है तो वो सब यही से मिल रहा है माता-पिता की सीख और आपके लोगो के मार्गदर्शन ने कहा कि, गलत को गलत कहने में कोई बुरे नहीं. वैसे तो कटु सत्य नहीं बोलना चाहिए किन्तु कई बार आवश्यक हो जाता है. श्रीरामचरितमानस में एक प्रसंग आता है जब अंगद जी रावण के दरबार में संवाद कर रहे होते हैं तो रावण भगवन श्री राम को बहुत भला-बुरा काहता है, इस पर अंगद जी को बहुत क्रोध आता है जिसे कुछ इस तरह दर्शाया गया है- "हब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा, क्रोधवंत अति भयऊ कपिंदा. क्योंकि. हरि हर निंदा सुनई जो काना, होई पाप गोघात समाना. बस इसीलिए मैंने भी ये सब लिखा है. पुनः आभार.........

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

कोई कविता लिखूं तो वो हाला बनें, मैं जहाँ पर लिखूं, मधु की शाला बने, जो कलम है मेरी ये पिलाती रहे, शब्द अंगूर को गुनगुनाती रहे, तेरे महिमा की हाला को प्याले में भर, खुद भी पीता रहूँ, और पिलाता रहूँ, हाथ रख दो जरा, साथ दो तुम मेरा, मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहूँ, मुझको आशीष दो……… मैं तो अल्पज्ञ हूँ, कैसे वर्णन करूँ, किस अलंकार में कौन सा रस भरूं, तेरा आँचल मिले, उसकी छाया तले, मेरी कविता खिले, मेरी भाषा पले, अब यही है विनय आखिरी पंक्ति में, शब्द दीपों को यूँ ही जलाता रहूँ, हाथ रख दो जरा, साथ दो तुम मेरा, मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहूँ, मुझको आशीष दो……… जयहिंद-जय हिंदी प्रिय आशीष जी, सस्नेह आपकी मनोकामना पूर्ण हो. शुभाशीष.

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

आदरणीय! सादर अभिनन्दन. प्रतिक्रिया के लिए आभार........ सही कहा आपने जिसकी जैसी दृष्टि है वो  वैसा देखता है. मैंने भी यही बात कहनी चाही थी सबसे पहले ही लिखा है, "हरि अनंत हरि कथा अनंता! सुनहि-गुनहि बहुविधि सब संता". जहाँ तक उन पंक्तियों के अर्थ को लेकर बात की जाय तो आपका मत भी सही है. और आदरणीय निशा मित्तल जी के एक प्रश्न लेख "एक जिज्ञासा छोटी सी" के उत्तर में श्री शंभू दयाल वाजपेयी जी का उत्तर बहुत सुन्दर और सटीक लगा है जिसमे उन्होंने लिखा है "- समुद्र और रावण दोनों ईश्‍वर की भी परवाह न करने वाले हैं। दोनों स्त्रियों के बारे में प्राय: एक सी बात कहते हैं। एक आत्‍म रक्षा में घबडा और गिडगिडा कर अपनी ही भर्त्‍सना करते हुए यह सोच कर कहता है कि शायद यह सुन कर मारने को अग्नि बाण ताने खडे श्री राम प्रशन्‍न हो जायें। वह कहता है – ढोल गंवार सूद्र पसु नारी , ये सब ताडन के अधिकारी। फिर स्‍पष्‍ट कर दूं कि यह कथन समुद्र का है। बचाव में आर्त समुद्र ( और, आरत काह न करै कुकर्मू) अपने बारे में कहता है- गगन समीर अनल जल धरनी, इनकै नाथ सहज जड करनी।" आप चाहें तो वो लेख पढ़ सकते हैं- http://nishamittal.jagranjunction.com/2010/09/28/%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%9B%E0%A5%8B%E0%A4%9F%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A5%80/

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन्ह तैसी" आशीष जी, सच तो यही है की प्रत्येक व्यक्ति अपने नज़रिए से दुनिया देखता है और अपने विचारों को ही सही ठहराने की कोशिशे भी करता है! आपकी समस्त बातों को छोड़कर मैं सिर्फ इस बात पर टिप्पड़ी करना चाहता हूँ, की ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी में....गंवार, शूद्र और नारी को पीटने का समर्थन किसी भी तरह से नहीं किया जा सकता, वो भी ऐसे परिवेश में जबकि आपने स्वयं शूद्र और नारी को शिक्षा ग्रहण करने की अनुमति नहीं दी, जब आपने स्वयं उन्हें अज्ञानी और गंवार बने रहने पर मजबूर कर रक्खा है तो आप किस आधार पर उन्हें प्रताड़ित करने का समर्थन कर सकते हैं! हाँ ऐसे वर्ग का कोई व्यक्ति जिसे समस्त प्रकार की छूट है, जिसे पढने-लिखने का अधिकार है, उसके बावजूद भी अगर उसका आचरण निकृष्ट कोटि का हो तो उसे प्रताड़ित करिए, फिर चाहे वो किसी भी वर्ग का हो....चाहे स्त्री हो या पुरुष हो!.......चित भी मेरी, पट भी मेरी का समर्थन करने वाली मानसिकता सरासर गलत है! दूसरी बात प्रताड़ित उन्हें करना चाहिए जो बिना किसी उचित आधार के किन्ही वर्ग विशेष के व्यक्तियों के साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं! http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/09/19/girlsvsboys/

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

आदरणीय वन्धु आशीष जी, मैंने आप का शोधात्मक आलेख देखा | श्रमसाध्य लेखन के लिए साधुवाद सहित आभार ! किन्तु किन्हीं विन्दुओं पर मेरी असहमति है -- “ढ़ोल गंवार सूद्र पशु नारी | सकल ताडना के अधिकारी | यहाँ उन्होंने कोई बात गलत नहीं लिखी. ऐसे महान कवि के ऊपर बिना सोंचे समझे दोषरोपण करना अन्याय होगा. न तो उन्हें अपने पुरुष होने का अभिमान था न ही उनके सीता-परित्याग की घटना लिख देने से राम के सम्मान में कोई कमी आती. |" निश्चित ही गोस्वामी जी निरभिमानी भक्त कवि हैं और उनहोंने अपनी सामयिकता के अनुरूप ठीक ही लिखा होगा; पर आज उन पंक्तियों के हवाले से देश- दुनिया में फैली नारियों की आधी आबादी तथा युग-युग से दलित-पीड़ित जनता जनार्दन का अपमान क्या उचित होगा | नारियों और दलितों की काफी आबादी आधुनिक युग में पढ़-लिखकर आगे बढ़ी है तथा शेष वंचितों एवं आज के वनवासियों-गिरिवासियों में उत्थान की बयार पहुँचने लगी है | अतएव भाई मेरे ! इस विन्दु पर अर्थ निकालने की चलती-चली आ रही गुरु-गंभीर परम्परा से हटकर नवीन व आधुनिक समाज के लिए प्रासंगिक मंतव्य देने की नितांत आवश्यकता है | जहाँ तक सीता-परित्याग की बात है, तो यह घटित घटना और वाल्मीकि-तुलसी के काव्य-विवेक तथा उसकी आवश्यकता एवं सामयिकता की दृष्टि एवं अपेक्षित काव्य-यति-विन्दु पर निर्भर करता है | अंतत: नारियों और दलितों के समर्थन में अधुनातन विचारकों से नवीनता बोधी विचार का मेरा निवेदन है |

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

ऐसे में यदि हिमालय के भविष्य की बात करें, तो वैज्ञानिकों का मानना है कि, हिमालय 5-6 सेन्टीमीटर प्रतिवर्ष उत्तर दिशा की ओर खिसक रहा है. आने वाले दो सौ मिलियन साल में यह शिफ्ट हो सकता है. परन्तु इस अवधि से पहले भी कई संकट आ सकते हैं. इस दौरान यहाँ उथल-पुथल हो सकती है, एक्टिव होने के कारण हिमालयी क्षेत्रों में छोटे-बड़े भूकंप आते रहेंगे. चट्टानें कमजोर होने के चलते भू-स्खलन का खतरा बना रहेगा. ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ सकती है. नदियों के सूख जाने का खतरा पैदा हो सकता है. छोटे ज्वालामुखी फट सकते हैं. लाखों साल के इस बदलाव में समुद्र के भी जगह छोड़ने की आशंका है. वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों का आकलन है कि हर 300-400 साल में “लिटिल आइस एज” आती है. भरी मात्रा में बर्फ़बारी होती है. यह चक्र स्वयं को दोहराता रहता है. ऐसा ही आगे भी चलेगा. मित्रवर आपका लेखन और लेखन शैली प्रभावित करती है ! आपने जिन महान लोगों का जिक्र किया है बहुत सुन्दर लगा ! हकीकत में आज हिमालय अपने हालात पर आंसू बहा रहा है ! बेहतरीन लेख

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

के द्वारा: Aniket mishra Aniket mishra

भाई आशीश नमस्कार तुमने सिर्फ धार्मिक एंगल से ये लेख लिखा । ईस का आर्थिक एंगल भूल गये । मैं लिखना चाहता था ईस विषय पर अब तुमने ही बात छेड दी है तो दुसरा भाग लिखो, अर्थिक एंगलवाला । केरला से ले कर उडिसा तक के समुद्र तट पर थोरियम नाम का पदार्थ मिलता है । जहांपर राम सेतु है वहां पर उस का खजाना है, राम सेतु के पत्थरों मे बडी मात्रा में थोरियम है । उस की किमत ४८ लाख करोड रुपिया आंकी गई है । दुनिया का सब से बडा जथ्था भारत में ही है । थोरियम युरेनियम की जगह ले सकता है । बिजली बनाने के लिए अणुशक्ति थोरियम से मिल सकती है । थोरियम का जथ्था अब अमरिका को चाहीए । हमारी मुर्ख सरकार ने वो जथ्था दे दिया है परमाणु संधी के बदले में । जाहिर में अमरिका हमे युरेनियम देगा और भारत उसे रुपया देगा । थोरियम का सौदा तो टेबल के निचे से हुआ है तो करुणानिधी और दूसरे भ्रष्ट नेताओं की कंपनिया राम सेतु तोडने के बहाने सारा मलबा अमरिका को भेज देगी जो ४८ लाख करोड का होगा । अमरिका चोरी का माल समज कर सस्ते में ही ले लेगा । मेरी बात पे मत जाना । थोरियम लिखकर, हिन्दी और अंग्रेजी में , गुगल कर लेना । बहुत सा रेफरंस मिल जायेगा । विडियो मिलेगा वो भी बराबर देख लेना ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

के द्वारा: aman kumar aman kumar

के द्वारा: Himanshu Nirbhay Himanshu Nirbhay

आदरणीय आशीष जी, सादर ! बहुत सशक्त रचना ! बेहद प्रभावशाली ! प्रवाह पर थोड़ा और ध्यान दें ! ""पन्द्रह अगस्त की शुभ बेला पर रवि का दरवाजा खुलता है सब ऊपर-ऊपर मुस्कुरा रहे पर अंदर से दिल जलता है जब आंखों की सूखी दरिया में सागर की लहरें उठती हैं जब भारत के वीरों की बलिदानी दिल में चुभती है जब भारत माता के आँचल में आग आज भी जलती है तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है"" ""पन्द्रह अगस्त की बेला पर रवि का दरवाजा खुलता है ! सब ऊपर से मुस्काते हैं पर अंदर से दिल जलता है ! जब सूखे नयन-समंदर में सागर-सी लहरें उठती हैं ! जब वीरों की बलिदान कथाएं मन उत्साहित करती हैं ! जब भारत माँ के आँचल में आग आज भी जलती है तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है"" हार्दिक शुभकामनाएं !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

आदरणीय सादर प्रणाम, सबसे पहले तो मैं आपको प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद कहता हूँ. ऐसा नहीं है कि मैं आपकी बातो से सहमत नहीं हूँ, या मैं एक्सपर्ट के निर्णय को गलत कहना चाहता हूँ. वरन कुछ वैज्ञानिको ने यह भी माना है कि जिसने भी सेतुसमुद्रम परियोजना बनायीं है उसने इस बारे में पूरी छान-बीन नहीं कि है. अगर किसी को यह लगता है कि मानवीय प्रगति के लिए कठोर कदम उठाया जाना आवश्यक है,तो सबसे पहले तो लखनऊ का अम्बेडकर पार्क तोडना चाहिए जहा केवल पैसो कि बर्बादी कि गयी है, उन हाथियों से क्या लाभ ले रही है सरकार? और पैसो के लिए हम अपनी इतिहासिक धरोहर खो दे यह भी तो अच्छा नहीं होगा. अगर आपको लगता है कि पैसा ज्यादा जरूरी है तो फिर सबसे पहले तो ताज महल तोडना चाहिए उसमें लगे संगमरमर तो काफी मंहगे बिकेंगे. प्राकृतिक आपदाओं का कही से भी आक्रमण हो सकता है, इसका मतलब ये तो नहीं कि जहाँ हमारी सुरक्षा का इंतजाम है उसे भी नष्ट कर दिया जाय, वैसा तो मृत्यु सबकी एक दिन होती ही है तो क्या कोई अपनी बीमारी का इलाज न कराये, मरते तो बड़े-बड़े नेता मंत्री भी हैं, तो फिर वे अपने अंगरक्षको पर पैसा क्यों लुटाते हैं, क्यों सरकार हमारे देश कि सीमाओं पर सैनिको को खड़ा करके पैसा खर्च कर रही है, उसी तरह यह भी एक हमारा सौभाग्य है कि बिना चाहे ही सुनामी के कहर से एक तरफ से कोई दिक्कत नहीं है हम उस दिक्कत को पैदा नहीं करना चाहेंगे. "इस मंच आने का सबका एक ही उद्देश्य है अपने विचारों से लोगो को अवगत करना, और दूसरों के विचारों को सुनना, वही मैं भी कर रहा हूँ, आप भी कर रहें हैं." मैं ये जानता हूँ कि वाद-विवाद इस मंच कि मर्यादा के खिलाफ है, और आप भी हमसे जीवन के अनुभवों में बड़े हैं, फिर भी मैंने ये धृष्टता की है जिसके लिए मैं आपसे और इस मंच से क्षमा मांगता हूँ.

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

आशीष जी, भावनायें और परिस्थियां दो अलग अलग वस्तु हैं.. रामसेतु से भारत के लोगों की भावनायें जुडी हैं इससे कोई इन्कार नहीं है. परन्तु मानवीय प्रगति के लिये कई बार कडे कदम लेने जरूरी होते हैं... जैसे डेम, सडक या कोई फ़ैक्टरी बनाते समय लोगों को विस्थापित करना. यहां तक सुनामी का सवाल है वह तो किसी और तरफ़ से भी आ सकती है. सभी आपदाओं से राम सेतु तो बचाने से रहा. आम आदमी के बजाये इस विषय पर एक्स्पर्ट ही सही निर्णय ले सकते हैं. यह सब में आपके लेख के संर्दभ में अपनी प्रतिक्रिया भर दे रहा हूं जो मेरी व्यक्तिगत राय है... मेरा मन्तव्य किसी के विचारों का विरोध करना नहीं है... लिखते रहिये और स्नेह बनाये रखिये.

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

दोस्त पहले आपको मेरा प्यार भरा नमस्कार | दोस्त आज के टाइम में डायर को डायर कहना भी गुनाह है | चोर को चोर कहना भी गुनाह है | अगर आप चोर को चोर कहते है तो चोर का अपमान होता है | और आपको चोर से माफ़ी मगनी चाहिए | ये इस देश में पहली बार नहीं हो रहा है लेकिन इस बार तो हद हो गयी है | किसी को आइना दिखाना सबसे बड़ी गलती हो गयी है | ये बात हम भी जानते है की संसद में चोर भी है डाकू भी है रेपिस्ट भी है | सभी है लेकिन अगर आप कहते है तो वो गलत है | उनका अपमान है और आपको बिशेशाधिकार हनन का नॉटिक मिल जाएगा | तो आज के टाइम में आप जनरल डायर को को डायर नहीं कह सकते है | क्योकि डायर कोई एक आदमी नहीं है | उस तरह का काम करने वाला हर वो व्यक्ति डायर ही है | लेकिन अगर हम कहते है तो वो गलत है | आप bas लिखते रहो | बहुत अच्छा लिखते ही | बार बार पड़ने का दिल करता है |

के द्वारा: www.ashuyadav.in www.ashuyadav.in

जी, ख़त तो अच्छा है...! इसके लिए वहां के लोगो दिल जितना होगा...! वहां के हालत कैसे है कभी वहां रहेंगे तो पता चलेगा.....एक सर्वे के अनुसार वहां के ९७ % लोग आज़ादी चाहते हैं मतलब एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं. २ % लोग पकिसन में विलय चाहते हैं और १% लोग भारत में.......ऐसा क्यों है? कभी विश्लेषण कीजियेगा.....! हम आप भगत सिंह और आजाद के देशभक्ति के किस्से सुनकर उनकी तारीफ़ करते नहीं थकते और खुद को गन तंत्र के हितैषी बताते हैं......क्या ९७ % लोगो की बात सुन सकते है.........................अभी आपको कुछ नहीं पता.....आप सिर्फ यह देख रहे है की वहां आतंकवाद है पर जो वहां अत्याचार भारतीय और पाकिस्तानीय सैनको का है. वह सिर्फ वहां की आवाम देख रही है...चाहें बात हो आजाद कश्मीर की या गुलाम कश्मीर की दोनों के हालात नाज़ुक है............!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आशीष आपने एक कहानी सुनी होगी कि एक बार एक शिष्य से पूछा गया कि वह अपने गुरू और भगवान में तुलना करे तो उस शिष्य ने अपने गुरू को भगवान से बढ़कर माना। मै यह सोंचता हूँ कि अगर गुरू और भगवान में तुलना की जा सकती है तो माता-पिता तो अतुलनीय हैं और उनका दर्जा तो भगवान से भी बढ़कर है फिर मै कैसे कह सकता हूँ कि मेरे माता-पिता मेरे भगवान हैं, आशीष मुझे अब तक के जीवन में गुरू का साथ नहीं मिला इसलिए मैने अपने काम को ही अपना भगवान मान लिया ......आपकी मैने दोनो रचनायें - सच्चा ईश्वर पढ़ी । आशीष यह मेरे व्यक्तिगत विचार हैं यदि किसी प्रकार की मुझसे गलती हुई हो तो मै क्षमाप्रार्थी हूँ। बहुत खूब रचना , धन्यवाद

के द्वारा: RAHUL YADAV RAHUL YADAV

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

के द्वारा: gopalkdas gopalkdas

के द्वारा: RAJEEV KUMAR JHA RAJEEV KUMAR JHA




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